भारतीय दवा कंपनियों के लिए सख्त नियम, WHO के स्टैंडर्ड का करना होगा पालन

नशीली दवा

नई दिल्ली। भारतीय दवा कंपनियों के लिए दवा निर्माण के सख्त नियम लागू कर दिए गए हैं। फार्मा कंपनियों को अब दवा बनाने में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) के स्टैंडर्ड का पालन करना होगा। दवा निर्माताओं को अपने उत्पादों की गुणवत्ता की जिम्मेदारी लेनी होगी। यह सुनिश्चित करना होगा कि जो दवा बनाई गई है उनसे मरीजों को किसी तरह का जोखिम नहीं हो। फार्मा कंपनियों को लाइसेंस के मापदंडों के मुताबिक ही दवा बनानी होगी। दवाओं को पूरी तरह से टेस्टिंग के बाद ही मार्केट में उतारना होगा।

दवा फैक्ट्रियों की जांच बढ़ाई

भारतीय दवा कंपनियों को इस साल से दवा निर्माण के सख्त नए मानकों का पालन करना होगा। केंद्र सरकार ने 2022 से विदेशों में भारतीय दवाओं से जुड़ी मौतों की घटनाओं के बाद यह निर्णय लिया है। इसके चलते दवा फैक्ट्रियों की जांच बढ़ा दी गई है ताकि इस दवा उद्योग की छवि को सुधारा जा सके।

निर्माता को लेनी होगी दवा गुणवत्ता की जिम्मेदारी

अधिसूचना में कहा गया है कि निर्माता को दवाओं की गुणवत्ता के लिए जिम्मेदारी लेनी होगी। इससे यह तय हो सकेगा कि वे अपने इच्छित इस्तेमाल के लिए उपयुक्त हैं। वे लाइसेंस की जरूरतों का पालन करते हैं। साथ ही अपर्याप्त सुरक्षा, गुणवत्ता या प्रभावशीलता के कारण रोगियों को जोखिम में नहीं डालते है।

अधिसूचना के अनुसार कंपनियों को केवल तभी किसी तैयार उत्पाद की बिक्री करनी चाहिए जब सामग्री के परीक्षणों पर संतोषजनक परिणाम प्राप्त हों। बैच के बार-बार परीक्षण या सत्यापन की अनुमति देने के लिए मध्यवर्ती और अंतिम उत्पादों के सैंपल की पर्याप्त मात्रा बरकरार रखें।

केवल एक चौथाई दवा कंपनियां पूरे कर रही मानक

गौरतलब है कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने अगस्त में कहा था कि दिसंबर 2022 से 162 दवा फैक्ट्रियों के निरीक्षण में आने वाले कच्चे माल के परीक्षण का अभाव पाया गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूओ) द्वारा निर्धारित अंतरराष्ट्रीय दवा निर्माण मानकों को भारत के 8,500 छोटे दवा कारखानों में से केवल एक चौथाई ही पूरा करते हैं।

छोटी कंपनियों ने समय सीमा बढ़ाने की मांग रखी थी

भारतीय दवा

बड़ी दवा कंपनियों को इन चिंताओं को छह महीने के भीतर और छोटे निर्माताओं को 12 महीने के भीतर दूर करना चाहिए। छोटी कंपनियों ने समय सीमा बढ़ाने की मांग की थी। चेतावनी दी गई थी कि मानकों को पूरा करने के लिए जरूरी निवेश से उनमें से लगभग आधे बंद हो जाएंगे। दरअसल, वे पहले से ही भारी कर्ज में हैं।