करंसी बैन से बढ़ा बुजुर्गों का दर्द: घर में देखभाल रुकी, अस्पताल भी दाखिल नहीं कर रहे

नई दिल्ली: “हे मोदी, बुजुर्ग हूं, बीमार हूं, बैंक में भी खड़ा नहीं हो सकता, उधार लिया तो उसने 500, 1000 के नोट पकड़ा दिए। सरकारी अस्पतालों में बुरा हाल है। प्राईवेट अस्पताल का डॉक्टर 500, 1000 का नोट ले नहीं रहा, दर्द बढ़ रहा है, जान पर बन आई है।”  नोट बंदी के बाद बुजुर्ग मरीज प्रधानमंत्री से ऐसी ही प्रार्थना कर रहे हैं। कालेधन का खात्मा करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उठाए गए इस साहसिक कदम के दो दिन बाद बीमार लोग कराहने लगे हैं। बुजुर्गों की घर में भी देखभाल नहीं हो पा रही और अस्पताल वाले दाखिल नहीं कर रहे, क्योंकि घर वाले सुबह बैंक की लाइन में खड़े होते हैं, लौटते वक्त शाम हो जाती है।
लोगों के इस दर्द को देखते हुए इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आइएमए) ने केंद्र सरकार से मांग की है कि सरकारी अस्पतालों की तर्ज पर प्राइवेट अस्पतालों में भी निर्धारित समय तक 500 और एक हजार के नोट स्वीकारने का प्रावधान किया जाए।
बता दें कि सरकारी अस्पतालों में 11 नवंबर की मध्यरात्रि तक 500 और एक हजार के नोट स्वीकारने का प्रावधान किया गया है। सरकारी अस्पतालों में ज्यादातर सुविधाएं मरीजों को मुफ्त मिल जाती हैं। इसके बावजूद अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन, डॉपलर सहित कई जांच हैं, जिसके लिए मरीजों को सरकारी में भुगतान करना पड़ता है और अकसर बाहर भी जांच के लिए जाना पड़ता है। सरकारी अस्पतालों में मरीजों से नोट स्वीकार भी किए जा रहे हैं। लेकिन वहां खुले पैसों की कमी है और दूसरा भीड़ इतनी है कि मजबूरन निजी अस्पतालों में मरीज जाने को विवश हैं। बड़े निजी अस्पतालों में डेबिट और के्रडिट कार्ड से भुगतान कर लोग इलाज करा रहे हैं, पर कई छोटे निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में डेबिट और क्रेडिट कार्ड से भुगतान की सुविधा नहीं होने के चलते मध्यम एवं निम्न आय वर्ग के मरीज परेशान हैं।
एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल ने कहा कि प्राइवेट अस्पताल व नर्सिग होम करीब 80 फीसद आबादी को चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराते हैं। इसलिए निजी क्षेत्र के अस्पतालों का चिकित्सा सुविधाओं से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में 500 और एक हजार का नोट स्वीकार नहीं किए जाने से स्वास्थ्य सुविधाएं प्रभावित हो रही हैं। आर्थिक तंगी से इलाज के अभाव में मौत होना तो मजबूरी कह सकते हैं, कहीं ऐसा न हो कि पैसे होते हुए भी रोगी की इलाज के अभाव में असमय जान चली जाए।