खतरे में भारत के नवजात, हर वर्ष 7 लाख बच्चों को बचाना संभव

नई दिल्ली: भारत में नवजात शिशु मृत्यु दर दुनिया में सर्वाधिक है, यह खुलासा कर डाटा एनालिस्ट इंडिया स्पेंड ने भारत के स्वास्थ्य सिस्टम पर सवाल खड़ा कर दिया। अध्ययन में कहा गया है कि भारत में विभिन्न प्रकार के रोगों से हर साल 48.10 फीसदी नवजातों की मौतें हो रही हैं, जो कि दुनिया में नवजातों की कुल मौतों का तकरीबन 26 फीसदी है। रिपोर्ट के आंकड़ों की मानें तो नवजातों की मौत 5.40 फीसद संक्रमण, 12 फीसद निमोनिया, 12.90 श्वास अवरोध, 7.10 फीसदी गंभीर बीमारियों एवं सबसे अधिक 48.10 फीसद समय पूर्व जन्म से होती है। इन बीमारियों से निपटने का समुचित इलाज हो तो अधिकांश नवजातों को बचाया सकता है।
नवजात शिशु की मौत यदि जन्म के 29 दिनों के भीतर हो तो, मौत को नवजात शिशु मृत्यु दर में दर्ज किया जाता है। आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर वर्ष तकरीबन सात लाख नवजात शिशुओं की मौत ऐसी बीमारियों से होती है जिनका इलाज संभव है, लेकिन विडंबना ये कि इस ओर स्वास्थ्य विभाग इच्छाशक्ति से प्रयास नहीं कर रहा है। नतीजा नवजातों की मृत्यु दर में कमी नहीं आ रही है।
जनसंख्या स्थिरता कोष के आंकड़ों पर गौर करें तो समस्त भारत में जीवित पैदा हुए प्रति एक हजार बच्चों में से 58 बच्चे मौत के मुंह में चले जाते हैं। विकसित देशों में यह संख्या पांच से भी कम है। ध्यान देने वाली बात यह भी कि देश के विभिन्न राज्यों के मध्य भी नवजातों की मृत्यु दर में काफी अंतर है। जैसे जीवित पैदा हुए प्रति 1000 में से केरल में शिशु मृत्यु दर 12 है, वहीं मध्य प्रदेश में 79 है।
विकासशील देशों में पैदा होने वाले कम भार वाले बच्चों में से 35 फीसदी अकेले भारत में हैं। विकासित देशों की कुपोषित बच्चों की संख्या सूची में भी 40 फीसदी बच्चे अकेले भारत में हैं।
पिछले दिनों मेडीकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी खुलासा किया गया कि नवजातों की कुल मौतों में से दो तिहाई मौतें जन्म के पहले सप्ताह होती हैं और इनमें भी दो तिहाई मौतें जन्म के दो दिन के भीतर होती हैं। इस प्रकार 45 फीसदी नवजात बचों की मौत 48 घंटों के भीतर हो जाती है।
यूनिसेफ की “द स्टेट ऑफ द वल्र्ड चिल्ड्रेन 2016” रिपोर्ट देखें तो 2015 में भारत में पांच साल के कम उम्र के तकरीबन 12.6 लाख बचों की मृत्यु ऐसी बीमारियों के चलते हुई जिनका इलाज आज की तारीख में उपलब्ध है। इन बीमारियों पर काबू नहीं पाया गया तो वर्ष 2030 तक दुनिया में तकरीबन सात करोड़ बच्चे मौत के मुंह में जा सकते हैं।