इस डर के इलाज के आगे जीत है

जाने माने शेफ विकास खन्ना को डर लगता है कि वे किसी ऊंची जगह पर सेफ नहीं है

नई दिल्ली/मुम्बई: जिसे ऊंची जगह पर जाने से डर का मनोरोग है तो उसे ऊंचाई पर नोबेल पुरस्कार भी मिलने वाला हो तो वह वहां नहीं जाएगा। इस डर को विज्ञान की भाषा में एक्रोफोबिया कहते हैं। शेफ के रूप में शोहरत की ऊंचाई तय कर चुके जाने माने रसोइया विकास खन्ना को यह फोबिया है। इसका खुलासा हाल ही में मुम्बई के इमेजिका में मास्टर शेफ इंडिया के 5वें सीजन की शूटिंग के दौरान तब हुआ जब उन्होंने वहां ज्वाइंट ह्वील (विशाल पहिए) पर राइड का लुत्फ लेने की प्रतिभागियों की जिद नहीं मानी। उन्हें अपने इस मनोरोग का खुलासा करना पड़ा।
विकास खन्ना की तरह अनेकों लोग ऊंचाई के इस डर की गिरफ्त में रहते हैं। यह डर जानलेवा भले ही न हो लेकिन यह डर इतना बढ़ जाता है कि उसे झेलना मुश्किल हो जाता है। यह डर मरीज के सामान्य जीवन की दिनचर्या पर बुरी तरह से प्रभाव डालने लगता है। लेकिन मनोचिकित्सकों का दावा है कि दवा और काउंसिलिंग से एक्रोफौबिया पूरी तरह से ठीक हो जाता है।
फोर्टिस अस्पताल समूह मनोचिकित्सा के प्रमुख डॉ. समीर पारिख इस सवाल पर मेडिकेयर न्यूज से बातचीत करते हुए कहते हैं- इस डर को अतार्किक डर की श्रेणी में रखा जाता है लेकिन मनोचिकित्सा मानता है कि इसका कुछ रासायनिक अधार भी होता है। डर इतना अधिक होता है कि अगर मरीज को किसी ऊंची जगह पर नोबेल पुरस्कार भी मिलना हो तो वह वहां नहीं जाएगा। डर की इंतिहा होने पर मरीज एक स्टूल की ऊंचाई पर चढ़ने से भी डरने लगता है।
डा. पारिख कहते हैं- ऊंचाई के डर के मरीज भारी संख्या में आते हैं। यह एक तरह की मानसिक व्यग्रता ( एंग्जाइटी डिजाडर है)। इस रोग का रासायनिक आधार भी होता है। न्यूरोट्रांसमीटर के असंतुलन का इस रोग के पीछे बड़ा होता है।
 डॉ. पारिख ने दावा किया कि कुछ दवाई के सेवन और काउंसिलिंग से उनके अधिकतर मरीज ठीक हो जाते हैं। फोबिया के कई  तरह के रोग होते हैं जिसमें एक्रोफोबिया यानी ऊंचाई से डर एक है। डॉ. पारिख ने आश्वस्त किया कि यह डर जानलेवा नहीं है लेकिन इसका इलाज करवा लेना चाहिए क्योंकि दिनचर्या को बुरी तरह से प्रभावित करता है। उन्होंने आगे कहा- जिसे इस डर का मनोरोग वह किसी भी सूरत में ऊंचाई पर नहीं जाएगा। अगर कोई डरते डरते वहां चला गया  इसका मतलब है उसे एक्रोफोबिया नहीं है।