कालाजार रोकना है तो पशुओं की स्क्रीनिंग जरूरी

खुलासा : बकरी के खून में पनपता है कालाजार का परजीवी लीश्मानिया
नई दिल्ली। कालाजार महामारी के संक्रमण का कारण पता चल गया है। एम्स के डॉक्टरों ने 15 साल के शोध के बाद पता लगाया है कि बकरी के खून में कालाजार का परजीवी लीश्मानिया पनपता है। क्लीनिकल माइक्रोबायोलॉजी और मोलेक्यूलर डिविजन के प्रमुख डॉ. सरमन सिंह के अनुसार कालाजार एक संक्रामक बीमारी है। इससे पीडि़त  मरीजों को ठीक होने के बाद त्वचा पर दाने निकल आते हैं। त्वचा की इस बीमारी को पीकेडीएल (पोस्ट कालाजार डरमल लीश्मेनियोसिस) कहते हैं। अभी तक यह मान्यता है कि कालाजार ठीक होने के बाद पीकेडीएल से पीडि़त व्यक्ति ही उस बीमारी के कारक बनते हैं। फ्लैबोटामस अर्जेटाइप्स नामक मक्खी (बालू मक्खी) पीकेडीएल से पीडि़त व्यक्ति को काटने के बाद जब किसी दूसरे व्यक्ति को काटती है तो कालाजार की बीमारी फैलती है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि कालाजार की बीमारी जानवरों से भी फैल रही है। बिहार के 12 जिलों से जानवरों के खून के सैंपल लिए गए। कुछ साल पहले उन सैंपल में कालाजार के परजीवी के एंटीबॉडी पाए गए। डॉ. सरमन सिंह का कहना है कि कालाजार की रोकथाम के लिए सरकार अभियान चला रही है। इस शोध के बाद यह जरूरी हो गया है कि जानवरों की भी स्क्रीनिंग की जाए और जो इस बीमारी से संक्रमित पाए जाते हैं, उनका इलाज कराया जाए।
बिहार में मिले ज्यादा केस
वर्ष 2015 में देशभर में कालाजार के करीब 8500 मामले सामने आए थे। इनमें से 6517 मामले अकेले बिहार से थे। झारखंड में 1262, उत्तर प्रदेश में 131, पश्चिम बंगाल में 576 मामले सामने आए थे। वर्ष 2016 में 5859 मामले सामने आए थे। अकेले बिहार में करीब 4500 मामले सामने आए थे।