दवाओं पर एमआरपी तय नहीं, दुकानदारों की बल्ले- बल्ले 

जयपुर। दवाओं की एमआरपी तय नहीं होने से मेडिकल स्टोर संचालक असाध्य रोगों की दवाओं पर भी मनमाफिक वसूली कर रहे है। दवा निर्माता कैंसर जैसी महंगी दवाइयों पर भी इच्छानुसार एमआरपी प्रिंट कर बाजार में सप्लाई कर रहे हैं। इसके चलते दस हजार रुपए तक की एमआरपी वाली दवा बाजार में 2500 से लेकर 10 हजार तक अलग-अलग कीमतों में मिल जाती है।
दरअसल, औषधि नियंत्रण अधिनियम में सभी दवाइयों की अधिकतम कीमत ही तय नहीं है। इसका फायदा निर्माता, वितरक और खुदरा विक्रेता जमकर उठा रहे हैं। इसलिए विक्रेता किसी भी एमआरपी वाली दवा के इच्छानुसार दाम वसूल रहे हंै। असल में अन्य उत्पादों की तरह निर्माता से डिपो, फिर वितरक, वितरक से खुदरा विक्रेता और फिर ग्राहक तक पहुंचते पहुंचते दवा के दाम 30 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ जाते हैं। जांच में यह भी सामने आया है कि वितरक उन्हीं दवाओं को अधिक बेच रहे हैं, जिन पर ज्यादा मुनाफा मिलता है। वितरकों के दबाव में दवा निर्माता कई गुना एमआरपी प्रिंट करते हंै।
यहां इन दवाओं की एमआरपी और विक्रय कीमत इसलिए दिखाई गई है कि यदि एमआरपी से कम दाम में वह बेची जा रही है तो ये दवाएं दिखाई गई एमआरपी पर भी विक्रय करने की विक्रेता को छूट है। इसका फायदा कुछ डॉक्टर भी कमीशन के रूप में उठा रहे हैं।
उदाहरण के तौर पर निर्माता ने किसी दवा को डिपो पर 2500 रुपए में भेजा। डिपो से यह दवा 4 प्रतिशत मुनाफे के साथ 2600 रुपए में वितरक तक। वितरक से 8 प्रतिशत मुनाफे के साथ खुदरा विक्रेता तक यह दवा 2808 रुपए में पहुंचेगी। खुदरा विक्रेता इसे 3370 रुपए में बेचेगा। यानी, यह इसकी एमआरपी होगी। लेकिन अधिकतम एमआरपी तय नहीं होने वाली दवा पर निर्माता एमआरपी पर ही इस दवा पर 8 से 10 हजार रुपए तक अंकित कर देता है, जिससे मरीज को पता ही नहीं चल पाता कि वास्तविक कीमत क्या है। इस तरह विक्रेता को 10 हजार एमआरपी की दवा को इससे कम तक किसी भी कीमत पर बेचने का अधिकार मिल जाता है। जबकि उसकी अप्रत्यक्ष अधिकतम कीमत 3370 रुपए या उसके आसपास ही होनी चाहिए। विक्रय की इस चेन की हर कड़ी का मुनाफा जयपुर के दवा कारोबार से जुड़े लोगों से बातचीत के आधार पर निकाला गया है। इस बारे में औषधि नियंत्रक अजय फाटक ने कहा कि तकरीबन सभी दवाइयां मूल्य नियंत्रण के दायरे में नहीं हैं। ऐसे में हम कुछ नहीं कर सकते। कैंसर जैसी दवा में भी ऐसा ही हो रहा है। कई मामलों में तो डॉक्टर मरीज को यह कह देते हैं कि तुम्हारी एक डोज फ्री करवा देता हूं। जबकि वास्तविकता में उसके पीछे मोटा मुनाफा छिपा होता है। करीब 350 दवाएं मूल्य नियंत्रण के दायरे में हैं। हम सिर्फ उन्हीं को देखते हैं।