जब दिल के इस डॉक्टर का दिल बल्लियों उछलने लगता है

डॉ. पुरुषोत्तम लाल एंजियोग्राम करते हुए दुआ करते हैं कि दिल भला चंगा निकले
नई दिल्ली: मेट्रो हॉस्पिटल समूह के चेयरमैन एवं जाने-माने हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. पुरुषोत्तम लाल अपने को रोक ही नहीं पाते। दिल की नलियों में ब्लॉक (अवरोध) की जांच के लिए एंजियोग्राम विधि करते हुए जैसे ही मॉनिटर पर उन्हें दिल चंगा दिखता है, उनका दिल बल्लियों उछलने लगता है। बेड पर लेटा मरीज भी सुखद आश्चर्य से भर उठता है। डॉ. लाल मरीज को उत्साह के साथ मॉनिटर दिखा कर वहीं बताने लगते हैं-  देखो, तुम्हारा दिल एकदम चंगा है, तुम्हें दिल को लेकर चिंतित होने की कतई जरूरत नहीं है। नोएडा सेक्टर- 12 स्थिति मेट्रो अस्पताल के कैथलैब के बाहर खड़े हो जाइए, डॉ. लाल की इस अदा पर रीझे ऐसे एक- दो लोग तो आपको मिल ही जाएंगे।
मेडिकेयर न्यूज से लंबी बातचीत के क्रम में इस सवाल पर डॉ. लाल कहते हैं- दिल को बीमार देखना मुझे पसंद नहीं। दिल चंगा निकलता है तो लगता है जैसे मेरी लॉटरी निकल गई। पता नहीं क्यों मैं अपनी खुशी छिपा नहीं पाता। दिल के डॉक्टरों में सबसे अधिक सम्मानित होने वाले पद्मविभूषण डॉ. लाल आगे कहते हैं- मैं तब और ज्यादा खुश हो जाता हूं जब 80-85 साल के किसी व्यक्ति की दिल की नलियों को ब्रैंड न्यू पाता हूं। मुझे ऐसे भी मिले हैं जो वर्षों से दिल की दवा ले रहे हैं लेकिन एंजियोग्राम में निकलता है कि उनका दिल एकदम भला चंगा है। मेरा एक मित्र मुख्य न्यायाधीश था। एम्स में उनके इसीजी में कुछ गड़बड़ी दिखी और तभी से दवा खा रहा था। एंजियोग्राफी के नाम से वह जज ऐसा नर्वस हो जाता कि पूछिए मत। चूंकि एंजियोग्राफ ही दिल की नली के अवरोध की जांच का सबसे प्रभावी (गोल्ड स्टैंडर्ड) तरीका है, इसलिए अगर वह एंजियो करा लेता तो दवा खाने की जरूरत ही नहीं होती। उनका एंजियो किया तो दिल सामान्य निकला।
अस्पताल की उनकी एक सहायिका कहती हैं- ‘एक दिन ऐसा हुआ कि जितनों ने एंजियोग्राम कराया सब के दिल नॉर्मल निकले। निराशा जताने पर डॉ. लाल ने यह कहते हुए मुझे डांट पिलाई कि इस पर तो खुश होना चाहिए, मैं दुखी क्यों हूं। डॉ. लाल कहते हैं- मैं किसी का एंजियोग्राम करना शुरू करता हूं तो सबसे पहले ऊपर वाले से दुआ कर लेता हूं कि उसका दिल भला चंगा निकले।
आज कोई भी आदमी किसी निजी अस्पताल में अपनी सेहत की जांच कराने आता है तो यह मान कर आता है कि उसे कुछ रोग नहीं भी निकला तो डॉक्टर  और अस्पताल पैसा कमाने के लिए उसका इलाज कर ही देंगे। यह बहुत हद तक सही भी है। चिकित्सा हलकों में एक शब्द कैप्टिव (बंधक) मरीज बेहद चर्चित है। मसलन, कोई छाती में दर्द के साथ अस्पताल पहुंचा तो समझिए वह उस अस्पताल का बंधक बन गया। अब डॉक्टर उसे जो भी कहेगा, उसे मानने के सिवा कोई चारा नहीं रहता। भले ही दिल का रोग न हो लेकिन छाती में दर्द लेकर गया मरीज बिना एंजियोप्लास्टी या बाईपास के अस्पताल से वापस घर लौट आए, ऐसे बिरले ही होते हैं । ऐसे में डॉ. लाल अगर भला चंगा दिल निकलने पर कैथ लैब में जश्न-सा मनाने लगते हैं तो यह अजूबा तो है ही। बल्कि कायदे से उन्हें तो दिल के ठीक ठाक निकलने पर सोच कर निराश होना चाहिए कि कमाई हाथ से गई। अस्पतालों पर अकसर ऐसे आरोप लगते रहते हैं कि दिल की नली में कोई ब्लॉक नहीं होने पर भी पैसा कमाने के लिए एंजियोप्लास्टी (दिल की बंद नली को खोलने की विधि) कर देते हैं। लेकिन मेट्रो में मरीजों को यह डर नहीं लगता।
यहां एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी के बीच का फर्क जानना जरूरी है। एंजियोग्राम से यह पता लगता है कि दिल की नलियों में अवरोध है या नहीं। अवरोध का पता चलने पर उसे खोलने के लिए स्टेंट लगाने की जो विधि होती है उसे एंजियोप्लास्टी कहते हैं जो काफी खर्चीली होती है। डॉ. लाल आगे कहते हैं- दिल की नलियों में अवरोध की जांच के लिए की जाने वाली एंजियग्राफी को लेकर एक मिथक है कि कराओगे तो कुछ न कुछ गड़बड़ निकल ही जाएगा। ऐसी बात कतई नहीं है। एंजियोग्राफी के बाद अनेकों दिल भले चंगे निकलते हैं। मैं एक महीने में करीब 150 की स्क्रीनिंग करता हूं। इनमें अनेकों दिल स्वस्थ निकलते हैं।
चिकित्सा क्षेत्र के प्रसिद्ध डॉ. बी.सी. राय पुरस्कार से सम्मानित मेट्रो एवं हृदय संस्थान के चेयरमैन डॉ. लाल ने बताया कि अब तक वे हृदय के स्वास्थ्य की जांच के लिए 35,000 लोगों की स्क्रीनिंग कर चुके हैं। वह जिस विधि से एंजियोग्राफी करते हैं वह मेट्रो कोरोनरी स्क्रीनिंग (एमसीएस) के नाम से पूरे देश में मशहूर है। यह विधि डॉ. लाल की ईजाद की हुई है। डॉ. लाल कहते हैं-  मैंने 1988 में हाथ की कलाई से एंजियोग्राम करने की विधि का ईजाद इसलिए किया क्योंकि लोग उस समय जांघ के जरिए की जाने वाली इसकी लंबी विधि से बहुत घबराते थे। तीन घंटे से अधिक समय लगता था, मरीज को शेविंग और फास्टिंग करनी पड़ती थी। फिर लंबे समय तक लेटे रहना पड़ता था। इसीलिए मैंने कलाई से जांच की यूजर फ्रेंडली एंजियोग्राफी ईजाद की। यह जांच महज 3 मिनट में होती है , बिना किसी तैयारी के और क्रिया पूरी होने के तुंरत बाद आदमी आफिस में जाकर काम करने लगता है। कपड़े भी नहीं उतारना, बाजू मोड़ कर खून की जांच की तरह मिनटों में दिल की जांच हो जाती है। शुरू में लोगों को विश्वास ही नहीं होता था कि एंजियोग्राम ऐसे बच्चों के खेल की तरह भी हो सकता है। उस समय इसे ठगी की संज्ञा भी दी गई। लेकिन आज पूरे देश में वह विधि प्रचलित है।
डॉ. लाल कहते हैं- मैंने चिकित्सा को कभी व्यवसाय के रूप में नहीं देखा। पैसा कमाना ठीक है लेकिन अस्पतालों को नैतिकता का रास्ता कभी नहीं छोडऩा चाहिए। उनका मानना है कि अस्पताल को मरीज गोद ले लेना चाहिए। मरीज को उसकी तकलीफ इस तरह बतानी चाहिए जैसे वह डॉक्टर के परिवार का ही कोई सदस्य हो क्योंकि आधी बीमारी प्यारभरी बात से ही दूर हो जाती है। मुझे प्रैक्टिस शुरू किए अब तक 30 साल हो गए, मैंने आज तक किसी मरीज से सीधे पैसे की बात नहीं की। मेरा वश चले तो मैं किसी दिल के इलाज का पैसा ही न लूं। मेरे अस्पताल के ओपीडी की सारी कमाई मरीजों की मदद में चली जाती है।
डॉ. लाल का मानना है कि इलाज का खर्च अस्पताल और मरीज के बीच पहले ही तय हो जाना चाहिए। अगर एंजियोप्लास्टी के लिए दो स्टेंट का मूल्य बताया गया तो एंजियोप्लास्टी करते समय तीन स्टेंट भी लग जाए तो अस्पताल को उस स्टेंट का पैसा नहीं लेना चाहिए क्योंकि ज्यादातर मरीज मध्यम वर्गीय परिवार के होते हैं। बिल का अचानक बढ़ जाना उनके लिए बहुत दुखदाई होता है। किसी मरीज की दुर्भाग्यवश मौत हो जाए तो बकाया राशि के लिए बहुत दबाव नहीं डालना चाहिए।