दवा कंपनियों को संतुलन बनाना जरूरी

नई दिल्ली। फूड एण्ड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन संयुक्त राज्य अमेरिका (USFDA) ने दो दवा कंपनियों पर बंदिशें लगा दी हैं। इसका असर यह हुआ कि इस क्षेत्र की भारतीय कंपनियों के शेयर प्राइस में गिरावट आ गई। यह लगातार तीसरा ट्रेडिंग सेशन था, जिसमें दवा कंपनियों के शेयरों पर दबाव रहा। दुनियाभर में कम कॉस्ट वाली दवाओं की सप्लाई करने वाली भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए शेयर होल्डर्स के हितों का मरीजों के हितों के साथ संतुलन बनाना तब तक अधिक मुश्किल नहीं था, जब तक स्स्नष्ठ्र ने कुछ कंपनियों के मैन्युफैक्चरिंग के तरीकों पर सख्ती नहीं की थी।
अब मरीजों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने में कोई कमी शेयर होल्डर्स की वेल्थ घटने का कारण बन रही है। मार्जिन, रिटर्न और सेल्स को बरकरार रखने के लिए क्वॉलिटी कंट्रोल, कंप्लायंस और बेस्ट मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिसेज काफी महत्वपूर्ण हो गए हैं। कंपनियां शेयर होल्डर्स के हितों को सुरक्षित करने के लिए कोशिशें कर रही हैं, लेकिन मरीजों के हितों को लेकर उनकी तरफ से उतनी पहल नहीं हो रही है। निवेशकों को आकर्षित करने के लिए कंपनियां इनवेस्टर मीटिंग, मैनेजमेंट कॉल आयोजित करना, तुरंत प्रेस रिलीज जारी करने से लेकर सीनियर मैनेजमेंट और बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में बदलाव जैसे कदम उठा रही हैं।
वे दवाओं की क्वॉलिटी में सुधार के लिए एफडीए कंसल्टेंट्स को हायर करने के साथ ही क्वॉलिटी के अलग हेड नियुक्त कर रही हैं। उदाहरण के लिए, ल्यूपिन ने हाल ही में एक विदेशी प्रोफेशनल को क्वॉलिटी का ग्लोबल हेड बनाया है। मैन्युफैक्चरिंग में बदलाव लाने के लिए कंपनियां बाहर से टैलेंट हासिल करने पर अधिक पैसे खर्च कर रही हैं। हालांकि, दवाओं की क्वॉलिटी में सुधार की उनकी कोशिशों का अधिक असर नहीं हुआ है। स्स्नष्ठ्र की ओर से लगातार वॉर्निंग मिलने से दवा कंपनियां और उनके शेयर होल्डर्स फिक्रमंद हैं। टॉप पांच फार्मा कंपनियों की एनुअल रिपोर्ट का विश्लेषण करने से यह पता चलता है कि कंपनियों की प्रायरिटी में अभी यह शामिल नहीं है। सिप्ला को छोडक़र बाकी सभी बड़ी दवा कंपनियों- सन फार्मा, डॉ. रेड्डीज लैब्स, अरबिंदो फार्मा और ल्यूपिन की एनुअल रिपोर्ट में ‘मरीज’ शब्द से कहीं अधिक इस्तेमाल ‘शेयरहोल्डर’ शब्द का हुआ है। सिप्ला की रिपोर्ट में मरीज शब्द 143 बार और शेयरहोल्डर शब्द 119 बार है। दुनिया की बड़ी फार्मा कंपनियां भी विवादों में फंसी हैं और भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए उनके पीछे चलना ठीक नहीं होगा। भारतीय कंपनियों के लिए क्वॉलिटी पर जोर बढ़ाना चीन जैसे एक अन्य बड़े मार्केट में उनके जाने की कोशिशों के लिए भी महत्वपूर्ण है। क्वॉलिटी बेहतर करने से भारतीय फार्मा कंपनियों को बड़े मार्केट्स में ग्लोबल कंपनियों को टक्कर देने में भी मदद मिलेगी।

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