जेनेरिक दवा है नहीं, ब्रांडेड लिखें तो फंसे

सूरत: सिविल अस्पताल से प्रतिदिन औसतन 1900 मरीजों में से मुश्किल से 400 ही जेनेरिक स्टोर से दवा खरीद रहे हैं बाकी 1500 मरीज प्राइवेट केमिस्टों से ब्रांडेड दवा खरीदने को मजबूर हैं जबकि बीते अप्रैल महीने में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की तरफ से सख्त निर्देश हैं कि डॉक्टर प्रिस्क्रिप्शन पर बड़े अक्षरों में जेनेरिक दवा ही लिखेगा। सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर भी खुलेआम ब्रांडेड दवाएं ही लिख रहे हैं। ऐसे में मरीजों को हर महीने 73 से 75 लाख रुपये तक नुकसान हो रहा है। सर्कुलर सभी राज्यों के स्वास्थ्य सचिव, मेडिकल कॉलेज के डीन, प्रिंसिपल, निदेशक और मेडिकल काउंसिल के अध्यक्षों को प्राप्त हो चुका है।
     अस्पताल में खुले स्टोर से जेनेरिक दवाएं 75 से 80 फीसदी तक डिस्काउंट पर दी जाती हैं। ब्रांडेड दवा बाजार में 10 से 20 गुना तक ज्यादा रेट पर मिलती है लेकिन मरीज तो वही दवा खरीदेगा जो डॉक्टर कहेगा। इस मुद्दे पर डॉक्टरों का अलग तर्क है। वह कहते हैं कि आधी दवाएं जेनेरिक और आधी ब्रांडेड लिख देते हैं। ऐसे में मरीज सारी दवाएं ही बाहर से खरीदता है।सिविल के आरएमओ डॉ. केतन नाइक कहते हैं कि जेनेरिक दवाओं का नाम तो लिखा जा रहा है लेकिन जेनेरिक मेडिकल स्टोर पर दवा मिलती ही नहीं। अब मरीज का इलाज तो करना ही है। मजबूरन ब्रांडेड दवा लिखनी पड़ती है। फिर स्वास्थ्य विभाग पूरी नजर रख रहा है। जानबूझकर कोई गलत कर रहा है तो उसके खिलाफ कार्रवाई करेंगे। उधर, मरीजों का कहना है कि जो दवाएं जेनेरिक में उपलब्ध हैं डॉक्टर उसमें भी ब्रांडेड दवा लिखते हैं।
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