अनदेखी कर रही सरकार, कोरोना की तीसरी लहर की आशंका, अभी भी अस्‍पतालों में स्‍टाफ का टोटा

जींद। जींद में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल है। जिला मुख्यालय पर नागरिक अस्पताल में डाक्टरों की कमी के कारण मरीजों को लगातार परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। विशेषज्ञों डाक्टर तो छोड़िए, खांसी-बुखार, पेट दर्द के मरीजों की जांच करने के लिए भी पर्याप्त डाक्टर नहीं हैं। इसके चलते मरीजों को निजी अस्पतालों में महंगा इलाज कराना पड़ रहा है।

सरकारी अस्पताल में कई साल से मेडिकल आफिसर (एमओ) की कमी चल रही है। प्रदेश सरकार की तरफ से सीनियर मेडिकल आफिसर के पांच पद मंजूर हैं, जिनमें से दो खाली हैं। इसी तरह एमओ के 55 पद मंजूर हैं, जिनमें से 32 पद खाली पड़े हुए हैं। यानि मात्र 23 पद भरे हुए हैं।

इन्हीं डाक्टरों में से इमरजेंसी में ड्यूटी लगती है, ओपीडी भी देखनी होती है और कोर्ट केस के लिए भी जाना होता है। कुछ डाक्टर छुट्टी पर भी रहते हैं। इस कारण अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाएं चरमराई हुई हैं। ओपीडी के हर कमरे के आगे मरीजों की भीड़ लगी रहती है। नागरिक अस्पताल में पहले रूटीन में 1000 से 1200 के बीच ओपीडी होती थी।
अब कोरोना काल में लगभग 400 से 500 के बीच ओपीडी हो रही हैं। मरीजों को सबसे बड़ी परेशानी स्पेशलिस्ट डाक्टरों की कमी से हो रही है। नेत्र रोग विशेषज्ञ नहीं होने से लंबे समय से अस्पताल में आंखों के आपरेशन बंद पड़े हैं। कान-नाक-गला यानि ईएनटी के डाक्टर का पद भी काफी समय से खाली पड़ा हुआ है। चर्म रोग विशेषज्ञ का पद करीब छह साल से खाली है। फिजिशियन की सेवाएं सप्ताह में मात्र दो दिन ही मिल पाती हैं। जबकि इन चारों विशेषज्ञों से संबंधित मरीजों की संख्या ज्यादा होती है।

मरीजों को सबसे बड़ी परेशानी विशेषज्ञ डाक्टरों की कमी के कारण हो रही है। मुख्यालय की तरफ से जींद की अनदेखी का हाल देखिए कि लंबे समय से फिजिशियन का पद भी खाली पड़ा हुआ है। हफ्ते में दो दिन जुलाना से फिजिशियन ओपीडी करने आते हैं। इसी तरह मात्र एक सर्जन है। उनको तीन दिन ओपीडी करनी होती है तो तीन दिन आपरेशन थिएटर में लगाने होते हैं। मजबूरी में ओटी वाले दिनों में पहले एक-दो घंटे ओपीडी भी करनी पड़ती है, फिर आपरेशन थिएटर पहुंचते हैं।

अस्पताल में रेडियोलोजिस्ट का पद कई साल से खाली पड़ा हुआ है। इस कारण अल्ट्रासाउंड की मशीन पर धूल की मोटी परत जम चुकी है। मरीजों को अल्ट्रासाउंड कराने के लिए बाहर मोटी फीस चुकानी पड़ती है। इसी तरह गायनोकोलिजिस्ट का पद भी नहीं है। स्किन विशेषज्ञ की कमी से भी मरीज परेशान हैं। शहर में मात्र एक निजी स्किन विशेषज्ञ है। मरीजों को वहां भी ज्यादा फीस चुकानी पड़ रही है। यही नहीं, कम से कम तीन बार जाना पड़ता है और हर बार महंगी दवा लेनी पड़ती है।

नागरिक अस्पताल में दो आर्थोपेडिक्स और एक सर्जन है। कई बार इनकी भी इमरजेंसी में ड्यूटी लगा दी जाती है, जिसका असर ओपीडी पर पड़ता है। जिस दिन इमरजेंसी में ड्यूटी होगी, उस दिन ओपीडी नहीं कर पाते हैं। ऐसे में मरीजों को धक्के खाने पड़ते हैं। डाक्टरों का कहना है कि सरकार मेडिकल आफिसर के सभी पद भर दे तो डाक्टरों की परेशानी दूर होगी ही, मरीजों को काफी राहत मिल जाएगी। कई बार ऐसा हो जाता है कि डाक्टरों डे-नाइट में लगातार ड्यूटी करनी पड़ती है।

सफीदों के कांग्रेस विधायक सुभाष गांगोली ने कहा कि सरकार जींद की अनदेखी की जा रही है। पंचकूला, अंबाला व करनाल जैसे शहरों में डाक्टरों में ज्यादातर पद भरे हुए हैं, जबकि जींद में आधे से ज्यादा पद खाली पड़े हैं। विशेषज्ञ डाक्टर तो जरूर तैनात करने चाहिए। सरकार नियमित डाक्टरों की भर्ती नहीं कर रही है और ठेके पर डाक्टर रख रही है। वह विधानसभा में भी डाक्टरों की कमी का मुद्दा उठा चुके हैं। जींद, सफीदों, नरवाना सहित पूरे जिलो के अस्पतालों व सीएचसी में डाक्टरों की कमी है, जिसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ रहा है।