जनऔषधि केंद्र – पुरानों की सुध नहीं, नए खोलने की तैयारी

झारखंड

गरीब लोगों को सस्ती दवा उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से सरकार द्वारा पूर्व में खोले गए जन औषधि केंद्रों की हालत बेहद खस्ता है। कई जगहों पर जन औषधि केंद्र केवल नामभर के रह गए है, उन पर दवाओं का घोर अभाव है और सरकार ने हालिया बजट में 3000 नए जनऔषधि केंद्र खोलने की घोषणा कर दी। झारखंड में पहले से मौजूद जनऔषधि केन्द्र दम तोड़ रहे हैं। झारखंड की सवा तीन करोड़ की आबादी को सस्ती सुलभ और गुणवत्तापूर्ण दवाएं उपलब्ध हो, इसके लिए करीब चार साल पहले जन औषधि केन्द्रों की शुरुआत हुई थी इस योजना के तहत राज्य से सभी जिला अस्पतालों तथा तीनों मेडिकल कॉलेजों में जनऔषधि केन्द्र खोले गए थे पर आज ज्यादातर केन्द्रों में दवा लगभग समाप्त होने को है। पेरासिटामोल, विटामिन, एंटिबॉयोटिक्स तक नदारद हैं. 280 दवाओं की जगह 30-40 दवाओं से काम चलाया जा रहा है, मरीज और उनके परिजन जनऔषधि केन्द्रों से बैरंग लौट रहे हैं, दवा के लिए जनऔषधि केंद्र पहुंचे सरफराज ने बताया कि डॉक्टर ने छह दवा लिखी है, पर एक भी नहीं मिल सकी। सदर अस्पताल के फार्मासिस्ट गिरि किशोर कुमार मानते हैं कि पैरासिटामोल, ओआरएस, एंटीबायोटिक आदि उनके पास उपलब्ध नहीं है।
सूबे के सभी जिला मुख्यालयों में जनऔषधि केन्द्रों की स्थिति यही है. हर बार सप्लायर द्वारा दवा सप्लाई करने में लेटलतीफी की बात कही जाती है अब तो रांची के सिविल सर्जन डॉ ए. के. चौधरी ने साफ कर दिया है कि दवा खरीद की वर्तमान व्यवस्था बदले बिना सुधार संभव नहीं है, वर्तमान में केवल आनुषंगिक इकाइयों से दवाएं लेने की व्यवस्था है।
खैर, बीमार लोगों के लिए जेनेरिक दवा की दुकानें बेहद फायदेमंद साबित हो सकती हैं. पर दवाओं के आभाव में सरकारी जनऔषधि केन्द्र दम तोडऩे के कागार पर हैं। जिससे गरीब लोगों पर बीमारी खर्च का बोझ बढ़ता जा रहा है।