मैगी के बाद केएफसी के उत्पाद से खतरा

लखनऊ(उत्तर प्रदेश)
मैगी के बाद एक बार फिर केएफसी के उत्पाद में प्रतिबंधित एमएसजी की पुष्टि होने की बात सामने आई है। जांच रिपोर्ट आने के बाद एफएसडीए ने प्रतिबंध उत्पाद के पैकेटों को सीज तो कर दिया, लेकिन लंबे समय तक लोग इसका सेवन करते रहे। खासकर बच्चे। गत एक वर्षो में यह छठा मामला सामने आया है, जब रिपोर्ट अनसेफ पाई गई है। दरअसल सेहत के लिए खतरनाक उत्पादों की ब्रिकी रोकने का कोई तंत्र अब तक विकसित नहीं हो पाया है। खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2005 में केवल जांच रिपोर्ट आने पर ही एफएसडीए खाद्य पदार्थ के उत्पादन और बिक्री पर प्रतिबंध लगा सकता है। उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने तक का अधिकार नहीं है। मैगी और केएफसी के मामले में भी ऐसा ही सामने आया है। मैगी में एमएसजी और लेड की मात्र खतरनाक स्तर से भी अधिक पाई गई थी। इसी तरह केएफसी में मीट तैयार करने में इस्तेमाल होने वाले मिश्रण में खतरनाक एमएसजी की पुष्टि हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि हमें ऐसा तंत्र विकसित करना होगा कि टेस्ट प्रक्रिया से गुजरने के बाद खाद्य उत्पादों की बिक्री करने की इजाजत मिले। दरअसल, खाद्य सुरक्षा को लेकर नियम कानून इतने लचर हैं कि अनसेफ पाए जाने के बाद भी लोग आसानी से बच निकलते हैं। आरोप साबित हो भी गए तो अधिक से अधिक छह माह की कैद और पांच लाख रुपये तक का जुर्माना है।

यही वजह है कि मिलावटखोर धड़ल्ले से अपने काम को अंजाम दे रहे हैं, क्योंकि घटिया और मिलावटी सामान बेचकर लाखों कमा लेते हैं। एकाध बार पकड़े भी जाएं तो कुछ जुर्माना देकर बच निकलते हैं। खाद्य पदार्थो की नमूने की जांच रिपोर्ट दो श्रेणियों में सुरक्षित और असुरक्षित में आती है। सुरक्षित श्रेणी के अंतर्गत मिलावट से जान का खतरा नहीं होता है। इसका मतलब है कि खाद्य पदार्थ में जो मिलावट है उससे जान का खतरा नहीं है। जबकि असुरक्षित श्रेणी में वह मामले जिनके इस्तेमाल से जान का खतरा हो सकता है। जैसे दूध में सिंथेटिक का इस्तेमाल किया गया हो। सुरक्षित श्रेणी में मिलावटखोर केवल जुर्माना भरकर छूट जाते है।
पांच प्रयोगशालाएं, रिपोर्ट महीनों में

सूबे में पांच जन विश्लेषण प्रयोगशालाएं हैं जहां नमूने जांच के लिए भेजे जाते हैं वैसे तो जांच रिपोर्ट 14 दिनों के भीतर मिल जानी चाहिए, लेकिन महीनों तक लैब से नहीं मिल पाती है। इसी का फायदा उठाकर मिलावटी सामान बाजार में बिकता रहता है। एफएसडीए के प्रभारी अधिकारी और सिटी मजिस्ट्रेट विनोद कुमार का कहना है कि खाद्य पदार्थो की जांच के लिए लगातार प्रशासन सक्रिय रहता है। जांच रिपोर्ट मिलने के बाद ही कार्रवाई करने का अधिकार है। शीघ्र जांच रिपोर्ट मंगाने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि समय रहते कार्रवाई हो सके।