सरकार मैंने आपका नमक नहीं खाया, फिर इतनी गोलियां क्यों खिला रहे हो

नई दिल्ली

तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख… दामिनी फिल्म में वकील और जज के बीच का यह चर्चित संवाद सबने सुना होगा। हमारे न्यायायिक ढांचे में फैसला बहुत बाद में आता है, उससे पहले तारीखों और बहस का लंबा दौर चलता है, लेकिन देश के स्वास्थ्य मंत्रालाय ने फिक्स कंबिनेशन दवा प्रतिबंध संबंधी फैसले में ऐसा कोई कॉलम नहीं रखा, जिसके तहत बहस, विमर्श या विकल्प पर संवाद हो सके। सीधा ‘दफा 302 टाइप’ फैसला। स्वास्थ्य विभाग के इस फैसले से मरीजों की जान पर और आफत आ पड़ी है। पहले जहां एक गोली खाने से मरीज को राहत मिल जाती थी, अब एक साथ 5-6 गोली खानी पड़ेंगी। ऐसे में चिकित्सक मरीज को एक दवा को दिन में तीन दफा खाने को कह देता था, तो मरीज को तीन गोली ही दिन में लेनी पड़ती थी, यदि कंबिनेशन दवा बंद होती है तो एक दिन में 15-18 गोली खानी पड़ेगी।

तेरह वर्षों से मेडीकेयर समाचार पत्र में अपने विचार रखने वाले फार्मा विशेषज्ञों ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि सरकार के इस फैसले से पैसे के अभाव में मरीजों की मौत का ग्राफ तेजी से बढ़ेगा। क्योंकि यदि एक कंबिनेशन दवा की अलग-अलग दवा बाजार में आएगी, तो उस हिसाब से उनका निर्माण खर्च भी तो उतने ही गुणांक में बढ़ेगा। प्राइवेट सेक्टर में तो चलो साधन-संपन्न लोग इस खर्चे को जैसे-तैसे वहन कर भी लेंगे, लेकिन सरकारी अस्पतालों और जन औषधि केंद्रों पर क्या हाल होगा, समझ से परे है। अभी 28 मार्च तक न्यायालय से फौरी राहत है। यदि उस दिन न्यायालय ने सरकारी फैसले को उचित ठहरा दिया तो सरकार देश के कौने-कौने में स्थापित सरकारी औषधि केंद्रों पर मरीजों के लिए एकदम से क्या व्यवस्था करेगी, इसका कोई विकल्प सरकार नहीं रखा है। क्योंकि सब जगहों पर करीब-करीब कंबिनेशन दवाओं की सप्लाई है। एक आम व्यक्ति से जब बात की तो उसके विचार सन्न कर देने वाले लगे। वह बोला, ‘पिछली सरकारे तो किश्ती में छेद ही कर रही थी, लेकिन यह सरकार तो सीधा डुबो रही है।’
जनता ने तो सरकार का ‘नमक’ नहीं खाया, लेकिन सरकार जनता से गब्बर स्टाइल में कह रही है ‘अब गोली खा’ वो भी जी भर के। हे राम