महंगी दवा का कड़वा सच

नई दिल्ली

देश में एक मजदूर की न्यूनतम दिहाड़ी 250 रुपये के आस-पास होती है। ऐसे में अगर वह टीबी जैसी गंभीर बीमारी का शिकार हो जाए, तो कंगाल ही हो जाता है। इस रोग के इलाज में उसे लगभग 1.2-1.5 लाख रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं, जो उसकी चार से छह साल की बचत होती है। यहां तक कि डायबिटीज जैसी बीमारियों की दवा में ही उसकी आमदनी का एक बड़ा हिस्सा खर्च हो जाता है। अंतरराष्ट्रीय दवा कंपनियों की नजर में भारत के ये तंगहाल उपभोक्ता दुधारु गाय से कम नहीं हैं।
एचआईवी मरीजों के लिए जरूरी डाराप्रिम नामक दवा को बनाने का लाइसेंस हासिल करके उन्होंने इसकी कीमत 20 डॉलर से बढ़ाकर 750 डॉलर कर दी। इस बढ़ोतरी को दवा उद्योग तक ने अन्यायपूर्ण कहा था। भारत में भी ग्लेनमार्क ने अबीरापारो और एवरमिल नामक दो कैंसर-रोधी दवाओं के दाम किस्तों में चुकाने की योजना आई है।120 गोलियों के पैकेट में आने वाली 250 एमजी की अबीरापारो की कीमत 39,990 रुपये है, जबकि 10 टैबलेट की पैकिंग में आने वाली 10 एमजी एवरमिल की कीमत 29,965 रुपये है। इसी तरह, एक दूसरी एंटी-कैंसर ड्रग ग्लिवेक की कीमत पिछले एक दशक में 8,500 रुपये से बढक़र एक लाख रुपये से ज्यादा हो गई है।

हेपेटाइटिस-सी की नई दवा सोवाल्डि की कीमत भी 1,000 डॉलर प्रति गोली है। कान का संक्रमण खत्म करने वाली दवा कॉरटिसपॉरिन (साल 1975 में ग्लैक्सो वैलकम द्वारा विकसित) की कीमत 10 डॉलर से बढक़र 195 डॉलर तक पहुंच चुकी है, जो इसे बनाने वाली इंडो हेल्थ सॉल्युशंस की नजर में तर्कसंगत और उचित है। हालांकि चीन में एकाधिकार का फायदा उठाने से रोकने के लिए बनी नियंत्रक संस्था एंटी-मोनोपोली रेग्युलेटर ने पांच घरेलू कंपनियों पर इसलिए आर्थिक दंड लगाया है, क्योंकि उन्होंने मिलीभगत करके एरोप्यूरिनॉल टैबलेट की कीमत बढ़ा दी थी। भारतीय जेनेरिक दवा निर्माण कंपनियों के बीच हो रहे वॉलेंटरी लाइसेंस समझौते के कारण जीवन रक्षक दवाओं की कीमतें बढऩे का अंदेशा है। इसी तरह, करीब चार दवाओं के आयात पर सीमा शुल्क में छूट की व्यवस्था को फिर से बहाल करने का ताजा फैसला बताता है कि गंभीर रूप से बीमार लोगों के लिए इन दवाओं की कितनी जरूरत है। कम से कम एक साल तक इन दवाओं के सेवन की बाध्यता कंपनियों के लिए अब सोने का खान बन गई है। स्वास्थ्य खर्च का 80 फीसदी तक हिस्सा ऐसा होता है, जिसकी पूर्ति बीमा द्वारा नहीं हो सकती, जबकि बाह्य रोगियों के इलाज पर होने वाले स्वास्थ्य खर्च का 70 फीसदी मूल रूप से दवाओं की खरीद पर ही खर्च होता है। अपने देश में सस्ती दवाओं तक पहुंच अब भी गंभीर समस्या बनी हुई है। सबसे बेहतर हालत वाली दिल्ली में भी महज 48.8 फीसदी ही सस्ती दवाएं मिल पाती हैं। आलम यह है कि पारासिटामोल जैसी दवा खरीदने के लिए भी भारत में अकुशल श्रमिकों को एक घंटा तक काम करने की जरूरत पड़ती है।