लचीले नियमों के कारण घटिया दवाओं को मंजूरी, सुप्रीम कोर्ट में याचिका

नई दिल्ली

दवा कंपनियों पर घटिया दवाएं बनाने के आरोप तो गाहे-बगाहे लगते ही रहे हैं। नया आरोप सरकार पर लगा है। इसके मुताबिक, लचीले नियमों के कारण घटिया दवाओं को भी मंजूरी दी जा रही है। फार्मा व्हिसलब्लोअर दिनेश ठाकुर ने इस सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की है। याचिका में स्वास्थ्य मंत्रालय, ड्रग्स कंसल्टेटिव कमेटी और सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (सीडीएससीओ) को प्रतिवादी बनाया गया है। इस याचिका से किसी कंपनी पर पेनाल्टी तो नहीं लगेगी, लेकिन दवाएं रिकॉल करने और घटिया दवाओं को मंजूरी पर रोक का रास्ता बन सकता है। देश का दवा उद्योग करीब एक लाख करोड़ रुपए का है। दिनेश ठाकुर ने कहा, ‘याचिका के पीछे पैसे पाने का कोई इरादा नहीं है। मैंने पिछले साल सूचना के अधिकार के तहत वकीलों की मदद से 100 से ज्यादा आवेदन किए। मैं जानना चाहता था कि नियम तोडऩे पर केंद्र और राज्य सरकारें क्या कदम उठाती हैं। कुछ मामले तो पांच साल पहले उजागर हुए थे। सीडीएससीओ और स्वास्थ्य मंत्रालय ने अभी तक जांच पूरी नहीं की है। अभी तक नियम तोडऩे वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई है।’

ठाकुर ने सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए याचिका में कहा है कि घटिया दवा के बहुत से मामलों में आपराधिक मामले दर्ज नहीं होते। राज्यों के ड्रग कंट्रोलर दोषियों पर मामूली पेनाल्टी लगा देते हैं। सीडीएससीओ के प्रमुख जीएन सिंह ने कहा, ‘हम व्हिसलब्लोअर का स्वागत करते हैं। लेकिन उनका इरादा साफ होना चाहिए। मुझे इस व्यक्ति के बारे में कुछ नहीं कहना है।’ रैनबैक्सी मामले का खुलासा किया था दिनेश ठाकुर ने-रैनबैक्सीमें दो साल नौकरी की। इन्होंने खुलासा किया था कि रैनबैक्सी ने किस तरह नियामकों को गलत जानकारी दी थी। तब अमेरिकी नियामक ने कंपनी पर 50 करोड़ डॉलर (3,350 करोड़ रु.) जुर्माना लगाया था। अमेरिका ने उन्हें 325 करोड़ रु. का इनाम दिया था। अभी कंपनी का दावा है कि उसने क्वालिटी और सेफ्टी के सभी नियमों का पालन किया है।