मंत्रालय के परामर्श पर कहीं बंद तो नहीं हो जाएंगी होम्योपैथी दवा

राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) ने भी माना खास कारगर नहीं होम्योपैथी

नई दिल्ली

होम्योपैथ, जिसने मर्ज दिया वही इसका इलाज करेगा की सोच के आधार पर काम करता है लेकिन आलोचक मानते हैं कि होम्योपैथ के नाम पर मरीजों को बेकार की मीठी गोलियां ही दी जाती हैं।
हालांकि फैकल्टी ऑफ होम्योपैथ के अनुसार, इस पद्धति से होने वाले इलाज को मरीज भी पसंद करते हैं। अनुमान है कि देश की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा, एनएचएस होम्योपैथ पद्धति पर लगभग 40 लाख पाउंड (करीब 40 करोड़ रुपया) खर्च करता है इसमें अस्पतालों और डॉक्टरों के प्रेस्क्रिप्शन शामिल हैं। होम्योपैथ इलाज पद्धति में जिस कारण से संक्रमण या बीमारी हुई हो, उसी तत्व को उसके सौंवे हिस्से तक पतला (डाइल्यूट) कर दिया जाता है।

इसके बाद इसे मीठी गोलियों में मिला कर मरीज को दिया जाता है। उदाहरण के लिए फूलों से एलर्जी के कारण होने वाले बुखार में परागण या घास के तत्व का इस्तेमाल होम्योपैथी में किया जाता है। होम्योपैथ चिकित्सक मानते हैं कि दवा जितनी डाइल्यूट होगी, उसका असर उतना ही गहरा होगा लेकिन आलोचक कहते हैं कि मरीजों को केवल चीनी की गोलियां मिलती हैं। एनएचएस का कहना है, इस बात के कोई पुख्ता सबूत नहीं हैं कि इस पद्धति से किसी प्रकार की बीमारी में कारगर साबित हुई हो।

गुड थिंकिंग सोसाइटी ने होम्योपैथ को एनएचएस की काली सूची में डालने की मुहिम छेड़ी थी। इनका कहना है कि यह शेड्यूल 1 ड्रग्स हैं और डॉक्टर इसे प्रेस्क्राइब नहीं कर सकते। सोसाइटी की संस्थापक  का कहना है, एनएचएस के पास सीमित संसाधन हैं और ऐसे में होम्योपैथ पर खर्च करना उचित नहीं है। सस्ते विकल्प उपलब्ध होने पर या अधिक कारगर न होने पर दवाओं को काली सूची में डाला जा सकता है। सोसाइटी ने इस संबंध में कोर्ट में मामला दायर किया है। जिसके बाद स्वास्थ्य कानून विभाग के सलाहकारों ने ईमेल पर कहा है कि मंत्रियों ने इस विषय में परामर्श करने का फैसला लिया है।