जागरूकता की कमी के चलते, जिले में हर वर्ष टीबी से 70 मौत

बारां / बिहार

चिकित्सा संस्थानों से उपचार अधूरा छोडक़र सामान्य मरीजों के बंक मारना तो आम बात है, लेकिन टीबी के मरीज भी अधूरा इलाज लेने के बाद गायब हो रहे है। मरीजों के परिवार व समाज में रहने से सामान्य लोगों का स्वास्थ प्रभावित होने की आशंका रहती है। बंक मारने वाले मरीजों को तलाशने का काम महज औपचारिकता ही साबित होता है।

जिले में प्रतिवर्ष टीबी रोगियों के गायब (डिफाल्टर) होने व मृत्यु होने के मामले बढ़ रहे है। जिले में आधा-अधूरा उपचार लेकर वर्ष 2012 में 50, 2013 में 63 टीबी रोगी लापता हो गए थे। जिले में वर्ष 2012 में 65 व वर्ष 2013 में 70 टीबी रोगियों की मृत्यु हुई थी। चिकित्सा सूत्रों के आंकड़ों के अनुसार जिले में औसतन  करीब 60 टीबी रोगी बंक मार रहे है तो 50 की रोगियों की मृत्यु हो रही है।

यहां मौजूद कर्मचारियों का कहना था कि घर व गांवों में नहीं मिलने के बाद डिफाल्टर घोषित रोगियों की दवाओं को सम्बंधित चिकित्सा संस्थान से वापस मंगवाया जाता है। मरीज के नहीं आने पर उसे डिफाल्टर घोषित कर दिया जाता है।

जिले मेे प्रतिवर्ष करीब 60 मरीज गायब हो रहे हैं। करीब 50 की मृत्यु हो रही है। इस मर्ज को समाप्त करने के लिए जनजागरूकता की भी जरूरत है। वैसे विभाग की ओर से मरीज को ढूंढकर उसे पूरा उपचार देने का प्रयास किया जाता है। कुछ रोगी की टीबी के अलावा अन्य कारणों से भी मृत्यु हो जाती है।