एम.सी.आई. ने उपहारों को लेकर जारी की सख्त गाइड लाइन

रोहतक

जिले में विभिन्न फार्मेसी कंपनियों के एमआर का जाल सरकारी अस्पतालों में चिकित्सक के केबिन तक फैला हुआ है। विभिन्न कंपनियों के एमआर डॉक्टरों को लुभाने के लिए न केवल कीमती उपहार देते हैं बल्कि उन्हें बड़े पैकेज भी उपलब्ध कराते हैं। इसके चलते चिकित्सक विशेष दवाओं को मरीजों के पर्चे पर लिखते हैं। इससे दवाओं की बिक्री पर बड़ा असर होता है। मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया की नई गाइड लाइन में ऐसी कंपनियों पर शिकंजा कसते हुए सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी है। अगर एमसीआइ की गाइड लाइन रंग लाई तो इसमें कोई संशय नहीं कि मरीजों को बड़ी राहत मिल सकती है।

उपहार में भी नहीं मोटे कमीशन का भी होता है खेल – दवा बनाने वाली दर्जनों कंपनियों में काम करने वाले एमआर बिक्री बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं। केवल निजी ही नहीं बड़ी संख्या में सरकारी चिकित्सकों को लुभाने के लिए वह उन्हें समय-समय पर कीमती उपहार देते हैं। इसकी एवज में वह रोगियों को अपनी कंपनी की दवा लिखने के लिए बाध्य करते हैं। दूसरी कंपनियों के एमआर के प्रलोभन के मद्देनजर प्रतिद्वंदिता शुरू होते है। दवा ब्रिकी में भी कमीशन का खेल ऐसे में चिकित्सकों को एक से एक बढक़र उपहार व पैकेज का प्रलोभन दिया जाता है। कई बार तो चिकित्सकों को दवा बिक्री के हिसाब से कमीशन भी निर्धारित कर दिया जाता है। जो कंपनी या उसका एमआर अधिक रुपये चिकित्सक को लुभाने में खर्च करता है। डॉक्टर उसी से संबंध स्थापित कर मरीजों को उसी कंपनी की दवा लिखने के प्रयास में रहते हैं।

बाहर की दवा लिखने की कुप्रथा पर भी कसेगी नकेल – विभिन्न कंपनियों और उनके एमआर के प्रलोभन का ही असर है कि सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध दवाओं की बजाय चिकित्सक बाहर की दवाएं लिखना पसंद करते हैं। दवा कंपनी बेशक चिकित्सक पर उपहार आदि में मोटे रुपये खर्च कर रही होए लेकिन इसका सीधा असर रोगी व उसके परिवार की ही जेब पर पड़ता है। मरीजों को चिकित्सक द्वारा सुझाई दवा खरीदनी मजबूरी होती है। अगर एमसीआइ की नई गाइड लाइन का असर दिखा तो निश्चित ही मरीजों व उनके परिवार को बड़ी राहत मिलेगी। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया का इस तरह का नया निर्देश अभी हमें नहीं मिला हैए इस संबंध में जो भी निर्देश उन्हें मिलेगा। उसका वह सख्ती से पालन करेंगे। 1रूबी चावलाए प्रधान रोहतक केमिस्ट एसोसिएशन।