68 प्रतिशत फार्मा में नहीं बन रहीं स्टैंडर्ड क्वालिटी की दवा

नई दिल्ली। दवा का सेवन करने से पहले आप सभी को अलर्ट रहने की जरूरत है। जांच में पाया गया है कि देश में 68 प्रतिशत फार्मा कंपनियों में स्टैंडर्ड क्वालिटी की दवाइयां नहीं बनाई जा रही हैं।

सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (CDSCO)  ने खराब क्वालिटी की दवाइयां बनाने वाली कंपनियों की पहचान के लिए देशभर में फार्मा कंपनियों में इंस्पेक्शन किया। जांच के दौरान माइक्रो, स्मॉल और मीडियम सेक्टर की करीब 68 प्रतिशत कंपनियों की दवाइयां ‘स्टैंडर्ड क्वालिटी’ की नहीं पाई गई। बताया गया है कि इन सभी एमएसएमई कंपनियां में से 30 प्रतिशत कंपनियों को काम बंद करने के आदेश जारी कर दिए गए हैं।

गौरतलब है कि वर्तमान में दवाओं के रिस्क बेस्ड इंस्पेक्शन का चौथा चरण चल रहा है। अभी तक 22 कंपनियों के 446 सैंपल लिए जा चुके हैं। इनमें 271 सैंपल में से 230 को स्टैंडर्ड क्वालिटी का पाया गया है, जबकि 41 स्टैंडर्ड क्वालिटी के नहीं मिले।गौरतलब है कि भारत में बड़ी दवा कंपनियां ब्रांडेड दवाओं का निर्माण करती हैं, जबकि एमएसएमई सेक्टर की कंपनियां मुख्य तौर पर जेनेरिक मेडिसिन बनाती हैं। इन दवाइयों की देश-विदेश में काफी डिमांड रहती है, इसलिए भारत सरकार अब इन कंपनियों की दवाओं की क्वालिटी को लेकर काफी सजग हो गई है।

बता दें कि इस साल अगस्त में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया ने ऐलान किया था कि जिन कंपनियों का टर्नओवर 250 करोड़ रुपए या उससे अधिक होगा, उन्हें 6 महीने के अंदर जीएमपी लागू करना होगा। अन्य कंपनियों को इसके लिए 1 साल मिलेगा। समय से ऐसा नहीं करने पर कंपनियों पर जुर्माना लगाया जाएगा।

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