भारतीय फार्मा कंपनियां मरीजों को लूट रहीं, कानूनी प्रावधानों को किया दरकिनार

पवन कुमार बंसल
गुरुग्राम। भारतीय फार्मा कंपनियां कानूनी प्रावधानों को दरकिनार कर मरीजों को लूट रहीं है। भारत को ग्लोबल फार्मेसी के रूप में जाना जाता है। यह दुनिया के 250 से अधिक देशों में जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा उत्पादक/आपूर्तिकर्ता है। दुनिया के 60 देशों के साथ वैक्सीन निर्माण/आपूर्ति में अग्रणी भी है। टीकों की आपूर्ति के मामले में देश ने कोरोना महामारी के दौरान दुनिया को अपनी उपस्थिति दर्ज करार्ई है। दुनियाभर में इस्तेमाल होने वाली हर तीसरी गोली भारतीय मूल की है।

इस नाम और प्रसिद्धि के साथ, देश को दवा की गुणवत्ता के मुद्दों का सामना करना पड़ रहा है – जाम्बिया, जम्मू कश्मीर, गुडग़ांव, या बड़ौदा द्रव मामले या अन्य अज्ञात या समान हताहतों में कई शिशुओं की मृत्यु के कारण घातक कफ सिरप का मामला हो सकता है।

अनुसूची एम में संशोधन

भारत ने हाल ही में दवाओं के निर्माण पर लगाम कसने के लिए अनुसूची एम में संशोधन किया है। लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि विश्व स्तरीय अनुसूची एम/जीएमपी नियमों के बावजूद, देश अब तक गुणवत्ता के मुद्दों पर अंकुश लगाने में बुरी तरह विफल रहा है। वैश्विक स्तर पर देश बैकफुट पर आ चुका है।

दवा इकाइयाँ अनुसूची एम/जीएमपी का अनुपालन नहीं करती 

हमारी अधिकांश छोटी और मध्यम स्तर की दवा इकाइयाँ अभी भी 1988 अनुसूची एम/जीएमपी का 100 प्रतिशत अनुपालन नहीं करती हैं। हाल के प्रकरणों से यह स्पष्ट भी हो चुका है। लेकिन फिर भी गैर जीएमपी इकाइयों के साथ वैश्विक स्तर पर दवाओं का उत्पादन और आपूर्ति करने का अपना सिलसिला जारी रखे हुए हैं।

इसी प्रकार, देश देश में निर्मित/बेची जा रही नकली दवाओं के काले धब्बे से छुटकारा पाने में सक्षम नहीं है। जैसा कि हिमाचल प्रदेश के छोटे से शहर में एक प्रसिद्ध टीवी चैनल द्वारा चलाए गए कथित अंडर कवर ऑपरेशन से स्पष्ट है। कथित तौर पर यूपी स्थित कुछ झोलाछाप डॉक्टरों द्वारा एक कमरे के आकार की छोटी अवैध दवा फैक्ट्री में नकली दवाओं का निर्माण और आपूर्ति की जाती है। इस अवैध फैक्ट्री में बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के प्रतिष्ठित ब्रांडों का निर्माण होता पाया गया। यहां तक कि यूनिट में लोकप्रिय ब्रांड नाम के तहत स्ट्रिप रोल, डाई, पैकिंग सामग्री और अन्य सामग्री भी संग्रहीत पाई गई।

नकली दवाओं का बड़े पैमाने पर निर्माण

यह कहना वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण और विडंबनापूर्ण है कि सीडीएससीओ/राज्य औषधि प्रशासन के भारी विस्तार के बावजूद, नकली दवाओं का बड़े पैमाने पर निर्माण हो रहा है। यह भारतीय औषधि नियामकों की विश्वसनीयता पर असर डालता है। ऐसे में दुनिया को भारत में बनी दवाओं की गुणवत्ता के बारे में आश्वस्त नहीं किया जा सकता और न ही इस कलंक को दूर किया जा सकता है। ऐसी नकली दवा इकाइयां देश का नाम खराब करने के लिए सर्वव्यापी हैं।

नियामक को मीडिया या अन्य एजेंसियों का इंतजार 

अब मिलियन डॉलर का प्रश्न पूछा जा रहा है। हमारा नियामक ऐसी नकली दवा इकाइयों तक पहुंचने/पता लगाने से क्यों कतराता है। क्या हमारे नियामकों में निगरानी, विशेषज्ञता या प्रतिबद्धता की कमी है। जबकि उसी समय मीडिया के लोग उन्हें जनता तक पहुंचाते/उजागर करते हैं। क्या हमारे नियामक ऐसी गतिविधियों पर कार्रवाई/रिपोर्ट करने के लिए मीडिया या अन्य एजेंसियों का इंतजार कर रहे हैं?

निर्माता/नियामकों की दया पर निर्भर मरीज

ईसी अधिनियम 1955 के तहत खाद्यान्न की तरह दवा को भी आवश्यक वस्तु के रूप में शामिल किया गया है। लेकिन बीमार इंसान दवा से तो बच नहीं सकता, जो जानलेवा हो सकती है लेकिन भोजन को कई दिनों तक नजऱअंदाज कर सकता है। इसलिए, वह निर्माता/नियामकों की दया पर निर्भर है। जिसे बीमार के लिए गुणवत्तापूर्ण दवाएं सुनिश्चित करने का यह नेक काम सौंपा गया है।

 

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