खास खबर :जेनेरिक दवा के रेट में मोटा खेल

नोएडा: सस्ते इलाज के नाम पर प्रचलित हुई जेनेरिक दवाओं पर ड्रग प्राइज कंट्रोल आर्डर (डीपीसीओ) लागू न होने के कारण कंपनियां मनमाने रेट पर दवा बाजार में उतार रही हैं। इससे रिटेलर और निजी चिकित्सक के मेडिकल स्टोर संचालक बड़ा फायदा ले रहे हैं जबकि मरीज की जेब ढीली हो रही है। जानकारों की मानें तो किसी भी बीमारी में चिकित्सक जो दवा लिखता है, उस दवा के सॉल्ट वाली जेनेरिक दवाएं काफी कम कीमत पर मरीज को मिल सकती हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि नामी दवा कंपनियां ब्रांडेड के साथ-साथ कम कीमत वाली जेनेरिक दवाएं भी बनाती हैं। मगर ज्यादा लाभ के चक्कर में चिकित्सक और कंपनियां लोगों को पूरी जानकारी नहीं देते। दवा सस्ती होने के बावजूद मरीज को जागरूकता के अभाव में केमिस्ट से महंगे दाम में खरीदने को मजबूर होना पड़ता है। चिकित्सक मरीज को दवा का साल्ट लिखें तो थोक विके्रता से मरीज कम दाम में दवा खरीद सकता है। कीमत में अंतर दस गुना तक हो सकता है।

कानून के जानकार बताते हैं कि जेनेरिक दवाओं के लिए सिर्फ साल्ट लिखा जाता है ताकि मरीज किसी भी मेडिकल स्टोर से उस साल्ट की सस्ती दवा प्राप्त कर सकें। ओमिप्राजोल, नॉरफ्लॉक्स, पैरासिटामॉल, एमलोडिपिन, एटीनोल सहित सैकड़ों साल्ट जेनेरिक दवाओं में उपलब्ध हैं। मगर कंपनियां साल्ट के नाम से दवाओं का रैपर न बनाकर ब्रांड के नाम से बनाती हैं। ध्यान दीजिए, जैसे पैरासिटामोल सामान्य रूप से बुखार के लिए इस्तेमाल होती है। बाजार में पैरासिटमोल साल्ट की दवाओं को विभिन्न नामों से बेचा जाता है। चिकित्सक जो दवा का नाम लिखता है, वह चिकित्सक के मेडिकल स्टोर के अलावा कहीं और नहीं मिलती है। चिकित्सक सीधा साल्ट लिखें तो मरीज कहीं से भी सस्ते दाम में दवाई खरीद सकता है।

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गरीब मरीजों के इलाज के लिए जेनेरिक दवाओं के लिए जन औषधि केंद्र खुलवाए थे। लेकिन औषधि केंद्रों पर मरीजों को सभी दवाएं उपलब्ध नहीं होती। मजबूरन मरीज प्राइवेट मेडिकल स्टोर या डॉक्टारों के क्लीनिक पर चलने वाले स्टोर से दवा खरीदता है। दवा के थोक विक्रेताओं की मानें तो जेनेरिक दवाइयों की गुणवत्ता ब्रांडेड दवाइयों से कम नहीं होती। जितना असर ब्रांडेड दवा करती हैं, उतना ही जेनेरिक दवाएं काम करती हैं। उनकी डोज, साइड- इफेक्ट, सामग्री ब्रांडेड दवाओं के बराबर ही होती है। ब्रांडेड दवा का दस गोली का पैकेट यदि 500 रुपये का है तो एक गोली की कीमत 50 रुपये बनती है। मगर इसी साल्ट की जेनेरिक दवाओं का पत्ता 100 रुपये में बाजार में मिल जाता है। थोक विक्रेता के यहां इसी पत्ते की कीमत 20 रुपये तक हो सकती है। खास बात ये कि यूरिन, किडनी, बर्न, हार्ट रोग, डायबिटीज, न्यूरोलोजी जैसी बीमारियों में तो ब्रांडेड और जेनेरिक दवा की कीमत में काफी अंतर देखने को मिलता है। इन बीमारियों में केमिस्ट से जेनेरिक दवा मांगें तो अकसर मना कर देते हैं। असिस्टेंट कमिश्नर ड्रग विभाग राजेश त्रिपाठी ने बताया कि इस तरह शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जाएगी। जेनेरिक दवाओं को मनमाने प्रिंट पर नहीं बेचा जा सकता है।