पीजीआई प्रकरण : कुर्सीलेवा साबित हुई एथिक्स की डोज

रोहतक : पीजीआई में हॉस्पिटल मैनेजमेंट के इकलौते सुपर स्पेेशलिस्ट डा. ब्रिजेंद्र ढिल्लो ने अपने आला अधिकारियों को एथिक्स की डोज ऐसी पिलाई कि उसका जबरदस्त रिएक्सशन हो गया। अधिकारियों को नजला हो गया और खुद ढिल्लो को हाइपरटेंशन। 
नजला कहीं न कहीं गिरना था। मरीजों की प्रयोगशाला में वीसी साहब ने डा. ढिल्लो को स्वदेशी कम्पनी द्वारा निर्मित 182 व 500 एमजी की टेबलेट खिला दी। उस टेबलेट का असर जबरदस्त देखने  को मिला। डा. ढिल्लो के अलावा संस्थान के अन्य डाक्टरों के शरीर में भी झुरझुरी दौड़ गई। अपनी झुरझुरी को कम करने के लिए कुछ डाक्टरों ने काम धाम छोडक़र चाय पी तो कुछ ने आपस में झुंड बनाकर अपने आप को रिलैक्स करने की कोशिश की। अधिकांश डाक्टर व अन्य लोगों ने यही कहा कि इस डायगनोज में उक्त डोज की जरूरत नहीं थी। यह बेकार में दी गई है। इस खुराक का इफैक्ट तो होगा, साइड इफैक्ट भी हो सकता है। आज नहीं तो कल होगा, कल नहीं तो परसों होगा। होगा जरूर। किसी भी विपरित परिस्थिति का उपचार करने का यह सही तरीका नहीं है। 
हाइपरटेंशन से उबरने के लिए डा. ढिल्लो कोर्ट गए और जमानत ले आए। उन्हें इंस्टेंट रिलीफ तो मिल गया लेकिन रोग शरीर में घर कर गया। इस रोग के बारे में डा. ढिल्लो ने बताया कि उन्होंने तो अपने आला अधिकारियों को आचार संहिता की डोज देने का प्रयास किया था। एथिक्स की डोज के बारे में उन्होंने न केवल पढा है बल्कि उसको करीब से महसूस भी किया है। एथिक्स एक अच्छी दवा है और यह चिकित्सा क्षेत्र में सबके लिए जरूरी भी है। जो यह खुराक नहीं लेता वह सच्चा डाक्टर नहीं हो सकता। जिस दिन यह उपचार करने का प्रयास किया गया उससे एक दिन पहले डेंटल कालेज के आडिटोरियम में प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज संस्था की ओर से एथिक्स पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था जिसमें वीसी सर भी पहुंचे थे।
डेंटल के प्राचार्य डा. संजय तिवारी ने एथिक्स को लेकर वीसी की तारीफ करते बताया कि एथिक्स वैसे तो आम जनमानस केे लिए आवश्यक होते हैं लेकिन डाक्टर के लिए सबसे अधिक जरूरी होते हैं। क्योंकि एक मरीज जब उपचार कराने आता है तो वह डाक्टर को सरेंडर कर देता है। जहां समर्पण हो वहां केवल एथिक्स होना चाहिए। गला काट व जेब काट उपचार नहीं।
वीसी साहब एथिक्स की डोज को एक ही दिन मेें भूल गए। एथिक्स में यह भी बताया जाता है कि आपके सामने जो भी मरीज हो या जो भी परिस्थिति हो उसको सहज भाव से स्वीकार करो। शांत दिमाग से उसका उपचार करो। मगर वीसी साहब ने संयम खोते हुए डीएमएस डा. ढिल्लो को बड़ी खुराक पिला दी। रिएक्सन लाजिमी था। डा. ढिल्लो ने कहा अथारिटी अथारिटी है, वह कुछ भी कर सकती है।
अथारिटी की सिफारिश पर राज्य सरकार ने डा. ढिल्लो को लेबर रूम के नोडल अफसर के पद से सस्पेंड  कर दिया है। बताते हैं कि उनके  नाम की एक और फाइल स्टोर में जमा थी, उसकी गर्द को साफ कर दिया गया है। बच्चा चोरी वाला मामला पीछे छूट चुका है। फाइलों में रोग का इलाज तलाश करने की कोशिश जारी है। हैरानी की बात यह है कि संस्थान में एक आला अधिकारी ऐसा भी है जो सीधे सीधे व्यवस्था की खामी का आरोपी है। उससे ऊपर व नीचे वाले अधिकारियों का तो ट्रीटमेंट किया जा रहा है लेकिन उसको खुराक पिलाने  की हिम्मत न तो स्थानीय अथारिटी की हो रही है और न राज्य सरकार को। वजह जूडिसरी में उसकी अच्छी खासी पहुंच बताई जाती है।
एथिक्स की डोज का रिएक्सन अभी शांत नहीं हुआ है। पीजीआई के अन्य डाक्टरों के शरीर में दौडऩे वाले रक्त का आवागमन संतुलित नहीं है। डा. राकेश गुप्ता के जबरन उपचार के बाद संस्थान को हल्का बुखार जरूर हुआ था लेकिन ढिल्लो को दी गई खुराक के बाद चिकनगुनिया की आशंका जताई जाने लगी है। इस रोग में शरीर का अंग अंग दर्द करता है। संस्थान में हरियाणा स्टेट मेडिकल टीचर एसोसिएशन चुप है। विशेषज्ञ डाक्टरों का कहना है कि एसोसिएशन की ईसीजी व एमआरआई दोनों टेस्टों की जरूरत है। हो सकता है रोग यहीं कहीं हो। अगर यहां नहीं है तो फिर सभी डाक्टरों को मिलकर संस्थान की सेहत को दुरुस्त करने के लिए सियासत के लिए नो एंट्री का बोर्ड लगा देना चाहिए।