दवा कंपनियों के बुरे दिन!

नई दिल्ली। नया साल दवा कंपनियों के लिए कुछ खास साबित होता दिख नहीं रहा है। बिजनेस स्टैंडर्ड में छपी खबर के मुताबिक, अमेरिकी बाजार में कीमत गिरावट का सिलसिला थमने की उम्मीदें भारतीय जेनेरिक दवा निर्माताओं के दिसंबर 2017 के तिमाही परिणाम के बाद कमजोर पड़ा हैं। इसका साफ मतलब है कि दवा कंपनियों के अभी भी अच्छे दिन आते नहीं दिख रहे है। अमेरिका में ल्यूपिन, डॉ. रेड्डीज, ग्लेनमार्क और सन फार्मा की अमेरिकी सहायक कंपनी टारो फार्मा की बिक्री 40 प्रतिशत तक घटी है जिससे उनका समेकित प्रदर्शन प्रभावित हुआ।

टारो को बिक्री वृद्घि में भी गिरावट है। जिसको लेकर टारो के मुख्य कार्याधिकारी उदय बल्डोटा ने कहा कि अमेरिकी जेनेरिक बाजार को लगातार चुनौतीपूर्ण मूल्य निर्धारण परिवेश और प्रतिस्पर्धी दबाव का सामना करना पड़ रहा है। इजरायल की कंपनी टेवा दुनिया की सबसे बड़ी जेनेरिक निर्माता है। तेवा ने भी दिसंबर तिमाही के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद पूर्व के अनुमानों की तुलना में 2018 में इसके कमजोर रहने की आशंका जताई है।

बताया जा रहा है कि बाजार को अगले दो वर्षों के दौरान नए उत्पादों की मंजूरी में 50 प्रतिशत की तेजी, खरीदारों के बीच समेकन बढ़ने और अपने उत्पाद पेश करने के लिए नए प्रतियोगियों के लिए अवसर मिलने से मदद मिलेगी। दो अंक की कीमत गिरावट से अमेरिकी जेनेरिक बिक्री में अगले तीन वर्षों के दौरान सालाना आधार पर 4-5 प्रतिशत की गिरावट को बढ़ावा मिलेगा।

अमेरिकी बाजार में बड़ी भारतीय जेनेरिक कंपनियों के संदर्भ में अरविंदो फार्मा इसका अपवाद रही है। एक प्रमुख दवा रेनवेला की पेशकश की मदद से कंपनी की अमेरिकी बिक्री 9.4 फीसदी बढ़ी। यह नई दवाओं की पेशकश और महज किसी एक उत्पाद पर कम निर्भर रहने की वजह से बेहतर वृद्घि दर्ज करने में सफल रही। अमेरिका में देर से प्रवेश करने वाली सिप्ला को इस क्षेत्र से अपने कुल राजस्व का महज 17 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त हुआ और इसलिए वह भारत और अन्य भूभागों की मदद से कुल वृद्घि की रफ्तार को संतुलित बनाए रखने में सफल रही। कुल मिलाकर देखा जाए तो इस वक्त दवा कंपनियों का खुराक फीकी पड़ती दिख रही है। हालांकि अब ये तो वक्त ही बताएगा कि दवा कंपनियों के अच्छे दिन कब आते है।