चिकित्सकों और दवा कंपनियों में सेटिंग का खेल

कानपुर। चिकित्सकों और दवा कंपनियों में मुनाफे को लेकर सेटिंग का खेल चल रहा है। उधर उनके इस खेल में बेचारे मरीज पिस रहे हैं। मरीजों को आसानी से मिलने वाली ब्रांडेड दवाओं के बजाय डॉक्टर लोकल कंपनियों/जेनरिक नाम की ब्रांड दवाएं (सेटिंग) धड़ल्ले से लिख रहे हैं। इसके एवज में उन्हें मुंह मांगा कमीशन मिलता है। यह भी जरूरी नहीं कि डॉक्टर की लिखी दवा पास के स्टोर पर मिल ही जाए, वह खास मेडिकल स्टोर पर ही मिलेंगी।

जीएसवीएम मेडिकल कालेज के एलएलआर (हैलट) एवं संबद्ध अपर इंडिया शुगर एक्सचेंज जच्चा-बच्चा अस्पताल, बाल रोग चिकित्सालय, मुरारी लाल चेस्ट अस्पताल, लक्ष्मीपत सिंहानिया हृदय रोग संस्थान (कार्डियोलॉजी) एवं स्वास्थ्य विभाग के उर्सला अस्पताल, डफरिन अस्पताल, केपीएम अस्पताल, कांशीराम चिकित्सालय एवं ट्रामा सेंटर हो या नर्सिग होम और निजी क्लीनिक में मरीज देखने वाले डॉक्टर। इनमें से 90 फीसद डॉक्टर सेटिंग की दवाएं लिख रहे हैं। शहर के बड़े सरकारी अस्पतालों के कई डॉक्टर तो ओपीडी में दवा कंपनियों के प्रतिनिधियों को बैठाते हैं और उनके अनुसार ही मरीजों को दवाएं लिखते हैं। सरकारी डॉक्टरों का अपना अलग खेल है। ओपीडी के दिन के हिसाब से दवाओं के नाम बदलते हैं। सोमवार को बैठने वाले डॉक्टरों की दवा दूसरी होगी और मंगलवार को बैठने वाले डॉक्टर की दवा का नाम दूसरा जबकि उन दवाओं के साल्ट एक ही होते हैं।

दवा कंपनियों एवं डॉक्टरों के बीच बिचौलिए काम करते हैं। दवा कंपनियों ने दवा बेचने का टारगेट दे रखा है। हालांकि दवाओं का मूल्य डॉक्टर व बिचौलिए के बीच बातचीत के बाद निर्धारित होता है। ऐसे में बिचौलियों ने ओपीडी एवं इमरजेंसी के दिन के हिसाब से अलग-अलग डॉक्टरों को पकड़ रखा है। उनके माध्यम से दवाएं लिखवाई जाती हैं। डॉक्टर को दवा लिखने का अपना टारगेट है। कार्डियोलाजी, एलएलआर, मुरारी लाल चेस्ट, जेके कैंसर एवं उर्सला के कई बड़े डॉक्टरों ने अपनी ओपीडी, इमरजेंसी एवं इनडोर का ठेका उठा दिया है। डॉक्टरों के बड़े नाम की वजह से दवाएं भी उसी तरह लिखी जाती हैं। भरपूर दवाएं लिखने पर वह उस हिसाब से निर्धारित राशि लेते हैं।

डॉक्टर मरीजों के पर्चे पर दवा लिखने के बाद दवा खरीदने के बाद उसे दिखाने का जरूरी फरमान सुना देते हैं। उनका तर्क है कि मरीज को दवा बताना जरूरी है। अगर मरीज उनकी लिखी दवा खरीद कर नहीं आए तो दो टूक जवाब होता है कि ऐसी-वैसी दवा खरीदी है। अब ठीक होने में मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं। दवा कंपनियों ने टारगेट की अलग-अलग श्रेणी बना रखी हैं। उसी हिसाब से इंसेंटिव देती हैं। अब इसका भुगतान पूरी तरह नकद होता है। जैसे-जैसे डॉक्टर टारगेट पूरा करते जाते हैं, उसके हिसाब से राशि बढ़ती जाती है। इसमें 40 फीसदी से लेकर 100 फीसदी तक है।