एलोपैथी डंके की चोट से आयुर्वेद की गति मंद, केवल व्यापार बढ़ा

नई दिल्ली

वैश्वीकरण की होड़ और पूरी दुनिया में बज रहे एलोपैथी के डंके के कारण आयुर्वेद का अस्तित्व खतरे में है। कारण लोग वैद्य की की पढ़ाई नहीं करना चाहते। इसमें आर्थिक लाभ नहीं दिखता। सरकार हमारे देश की इस पारंपरिक  इलाज विधि के लिए अलग मंत्रालय (आयुष) तो बनाती है मगर इसका बजट नहीं बढ़ाती। एलोपैथी के विकास के लिए 30 हजार करोड़ रुपये और आयुर्वेद के लिए एक हजार करोड़। फर्क साफ समझ में आ जाता है।
देश के हर शहर में एलोपैथी कॉलेज हमारी सरकारों का सपना है, मगर यह सपना आयुर्वेद के लिए नहीं देखा जाता। उदाहरण के लिए, देश में एलोपैथी के मेडिकल कॉलेजों की संख्या करीब 400 है, जिसमें एमबीबीएस के छात्रों की 50,000 से अधिक सीटें हैं। इनमें गुणवत्ता नियंत्रण का काम मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के पास है, जबकि आयुर्वेद के स्नातक स्तरीय कॉलेजों की संख्या 254 है, जिसमें कुल सीटें 11,927 हैं। इनमें से अधिकांश कॉलेज सुविधाओं के मामले में शून्य हैं। आयुष मंत्रालय गाइडलाइंस तो बनाता है, मगर हकीकत यही है कि उन पर अमल हो रहा है या नहीं यह ध्यान नहीं देता।
यही वजह है कि देश में एलोपैथी दवाओं का बाजार एक लाख 30 हजार करोड़ रुपये का है, जबकि आयुर्वेदिक उत्पादों का बाजार बामुश्किल 10 हजार करोड़ रुपये का। इसका भी बड़ा हिस्सा दरअसल, सौंदर्य प्रसाधन और जीवनशैली से जुड़े उत्पादों का है। जहां तक आयुर्वेद से गंभीर रोगों के इलाज का सवाल है, एक बहुत बड़ा भ्रम यह फैलाया जाता है कि इसके लिए एलोपैथी ही कामयाब चिकित्सा पद्धति है जबकि हकीकत यह है कि सभी तरह की बीमारियों के इलाज में आयुर्वेद एक कारगर पद्धति है। इस संवाददाता ने एलोपैथी के कई चिकित्सकों को भी पतंजलि की दुकान में आयुर्वेदिक दवाएं खरीदते देखे हैं। महर्षि आयुर्वेद कंपनी से जुड़े वैद्य अच्युत कुमार त्रिपाठी कहते हैं कि जीवनशैली से जुड़े रोगों के उपचार में आयुर्वेद का कोई मुकाबला ही नहीं है। शतावरी, अश्वगंधा, पुष्करमूल, अर्जुन, भूम्यमालकी, कुटकी, पुनर्नवा, सदाबहार जैसे औषधीय गुणों वाले पौधे और तीन फलों के मेल से बनी त्रिफला आदि औषधियां वैद्यों की सलाह से ली जा जाएं तो गंभीर रोगों का भी निदान किया जा सकता है।
आयुष मंत्रालय के सचिव अजित शरण एक राष्ट्रीय पत्रिका को दिए बयान में कहते हैं कि मंत्रालय का बजट नहीं बढ़ा मगर यह भी कहते हैं कि उपलद्ब्रध पैसे में ही सर्वश्रेष्ठ कार्य करने का प्रयास किया जा रहा है। यह पूछे जाने पर कि मंत्रालय अब आयुर्वेदिक दवाओं के क्लिनिकल ट्रायल की बात कर रहा है मगर इसके लिए जितनी सुविधाओं की जरूरत है क्या वह देश में उपलब्ध है, शरण ने कहा कि दरअसल यह फैसला आयुर्वेद के प्रति लोगों के विश्वास को बढ़ाने के लिए लिया गया है।
अभी हो यह रहा है कि अखबारों में भ्रामक विज्ञापन देकर आयुर्वेदिक दवाओं से कद बढ़ाने, गंभीरतम बीमारियों का इलाज करने या ऐसे ही तमाम दावे किए जाते हैं जबकि हकीकत में ऐसा होना संभव नहीं है। जाहिर है कि इससे आयुर्वेद के प्रति लोगों का भरोसा डगमगाता है। इसलिए यह तय किया गया है कि अब नई दवाओं को क्लिनिकल ट्रायल के बाद ही मंजूरी दी जाएगी। रही बात इसके लिए जरूरत सुविधाओं की तो अभी मंत्रालय इसका आकलन कर रहा है और जरूरी दिशानिर्देश कंपनियों, चिकित्सकों, शोधार्थियों से बात कर तैयार किए जाएंगे। आयुर्वेद को लेकर एक अन्य समस्या दवाओं की कमी की है।
इस बारे में आयुष सचिव ने कहा कि दअसल राज्यों में जो आयुष केंद्र खोले गए हैं उनमें दवाओं की उपलब्?धता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। आयुष मंत्रालय दवा का पैसा राज्यों को दे देता है और राज्य अपने स्तर पर दवा खरीद कर उसकी आपूर्ति करते हैं। अगर किसी राज्य में दवा की आपूर्ति पर्याप्त नहीं है तो इस बारे में राज्य सरकार को ध्यान देना चाहिए।