भारतीय दवा कंपनियों को चुनौती

नई दिल्ली। भारतीय दवा कंपनियों को विदेशी बाजार में पैठ जमाए रखना काफी दुष्कर हो चला है। अमेरिका में चुनौतियां मिलने पर देसी कंपनियों के लिए अफ्रीकी बाजार काफी बेहतर रहा है। अब यहां भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। संस्थागत बिक्री या टेंडर कारोबार में भारतीय फार्मा के लिए चुनौतियां बढ़ गई हैं। पांच बड़ी कंपनियां-सिप्ला, अरबिंदो, स्ट्राइड्स शासुन, इप्का लैब्स और अजंता फार्मा- मलेरिया रोकथाम और एंटी-रेट्रोवायरल (एआरवी) टेंडर कारोबार में लगी हैं। मार्च तिमाही और 2017-18 में इस खंड में बिक्री में बड़ी गिरावट दर्ज की गई। देरी, ग्लोबल फंड जैसे संगठनों के लिए रकम में कटौती औैर कीमतों के दबाव से पैदा हुईं दिक्कतें कच्चे माल की कीमतों में तेजी से और अधिक बढ़ गई हैं। इससे इन दवा कंपनियों के राजस्व और प्राप्तियों पर असर पड़ा है। सबसे पहले सिप्ला पर नजर डालते हैं। कंपनी के ग्लोबल एक्सेस (टेंडर) कारोबार में 54 प्रतिशत गिरावट दर्ज हुई है। सिप्ला के प्रबंध निदेशक एवं ग्लोबल चीफ एग्जीक्यूटिव उमंग वोहरा ने कहा कि कंपनी का ग्लोबल एक्सेस बिजनेस (एंटी-रेट्रोवायरल) कारोबार तिमाही के दौरान पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 54 प्रतिशत कम रहा। वित्त वर्ष 2017 में ग्लोबल एक्सेस बिजनेस ने करीब 14.5 करोड़ डॉलर का कारोबार किया, जो वित्त वर्ष 2017 में 24 प्रतिशत घटकर 11 करोड़ डॉलर रह गया।
 दूसरी दवा कंपनियों को भी ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ा। मलेरिया रोकथाम टेंडरों के लिए कम वित्त पोषण और एंटी-रेट्रोवायरल कारोबार में लागत बढऩे से स्ट्राइड्स का टेंडर कारोबार चुनौतियों का सामना कर रहा है। कंपनी के कार्यकारी वाइस-चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक ने हाल में संकेत दिया था कि संस्थागत कारोबार को अब तक की सबसे बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि मलेरिया की दवाई के खंड में संभावनाएं कम हैं और पहले के मुकाबले लगभग ना के बराबर है।
 स्ट्राइड्स जैसी कंपनियों को पेश आ रही चुनौतियों पर आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज के श्रीराम राठी और विनय बाफना का कहना है कि नए मलेरिया टेंडर आकार में घटकर आधे रह गए हैं, वहीं प्रतिस्पद्र्धा भी अधिक हो गई है। एआरवी खंड में मार्जिन प्रभावित हो रहा है, क्योंकि तय अनुबंधों से कंपनियों को कच्चे माल की ऊंची लागत का सामना करना पड़ रहा है।  अरबिंदो फार्मा का राजस्व इस कारोबार से 29 प्रतिशत कम होकर 8.4 अरब रुपये रह गया। कंपनी एआरवी फॉम्र्युलेशन की भी आपूर्ति करती है। कंपनी प्रबंधन ने संकेत दिए कि मार्च तिमाही में यह सालाना आधार पर 43 प्रतिशत कम होकर 1.49 अरब रुपये रह गया। एक प्रमुख उत्पाद की कीमत को लेकर असहज स्थिति और विभिन्न देशों द्वारा टेंडर में कमी करने से आंकड़े कमजोर रहे। हालांकि कंपनी को वित्त वर्ष 2019 अच्छा रहने की उम्मीद है, क्योंकि यह एक नए एआरवी फॉम्र्युलेशन की तरफ बढ़ रही है और नए ऑर्डर आने की भी उम्मीद है।  संस्थागत कारोबार में सबसे करारी चोट अजंता फार्मा पर पड़ी है। मार्च तिमाही में सालाना आधार पर कंपनी के अफ्रीका में संस्थागत कारोबार राजस्व 22 प्रतिशत कम हो गया। वित्त वर्ष 2019 में भी यह दबाव जारी रहने वाला है। एसबीआईकैप सिक्योरिटीज के कुणाल धमेशा का कहना है कि अफ्रीका में कारोबार को वित्त वर्ष 2019 में अहम चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। कीमतों के दबाव और पुरानी कंपनियों के दोबारा लौटने से इसकी हिस्सेदारी कम होने से हालात खराब हो सकते हैं। कंपनी प्रबंधन का मानना है कि वित्त वर्ष 2019 में अफ्रीका कारोबार से कुल राजस्व में दो तिहाई तक की कमी आ सकती है। इससे कंपनी के परिचालन मार्जिन पर भारी होगा। आने वाली कुछ तिमाहियों में वैश्विक निविदा शुरू हो सकती है, लेकिन इन सौदों को लेकर अनिश्चितता और इनकी कीमत कंपनियों के लिए थोड़ी चिंता का विषय होगा। कच्चे माल का खरीद मूल्य अधिक और बड़ी संख्या में प्रतिस्पर्धियों के मद्देनजर निकट भविष्य में मुनाफे पर दबाव जारी रह सकता है।