स्वास्थ्य असमानताओं को खत्म करने के लिए बहुआयामी एवं व्यापक रणनीति की जरूरत: डॉ. ओ.पी.कालरा

आजादी से ही भारत की स्वास्थ्य प्रणाली समाज के सबसे वंचित सदस्यों की जरुरतों को पूरा करने की चुनौती का सामना कर रही है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में अभूतपूर्व तकनीकी सुधारों एवं प्रगति के बावजूद सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति के आधार पर असमानताएं जारी हैं। मंहगा होता इलाज एवं स्वास्थ्य के बढ़ते प्राईवेटाईजेशन की वजह से 75 प्रतिशत लोग इलाज पाने के लिए अपनी जेब से खर्च करने के लिए मजबूर हैं। इसी वजह से हर साल लगभग 39 लाख भारतीय गरीबी रेखा में शामिल हो जाते हैं। स्थिति की गंभीरता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि एक गरीब परिवार मे पैदा हुआ शिशु की एक बेहतर परिवार के शिशु की तुलना में प्रथम वर्ष में मृत्यु की संभावना अढाई गुणा होती है,जो पांच साल तक लगभग चार गुणा बढ़ जाती है।
  यह स्थिति केवल भारत वर्ष की ही नहीं, उन विकसित देशों की भी है, जहां समाज में गरीब और अमीर के बीच भारी अंतर देखा जाता है। इसका जीता जागता उदाहरण है यूरोप एवं अमेरिका, जहां समाज के आर्थिक एवं सामाजिक आधार पर विभिन्न वर्गों में जीवन प्रत्याशा में काफी अंतर है।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में समानता को लम्बे समय से एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रुप में माना गया है। आजादी से पूर्व भोर कमेटी ने भी इसका व्याख्यान किया था, इसके बाद आल्मा आटा डैकलेरेशन, हैल्थ फॉर आल बाई 2000 एवं नेशनल हैल्थ पॉलिसी 2002 मे भी स्वास्थ्य क्षेत्र में समानता को जोर दिया है, परंतु इसका व्यावहारिकरण आज के तेजी से बदलते परिपेक्ष में बहुत जटिल है।
नेशनल हैल्थ पॉलिसी 2002 में ये माना गया है कि सभी लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए प्राइवेट क्षेत्र का उचित उपयोग लेना जरुरी है, परंतु व्यावसायिकरण के इस दौर में प्राईवेट क्षेत्र की प्रतिबद्धता संदेह के घेरे मे है। इसका एक उदाहरण सरकारी सब्सिडी पर बने सुपरस्पेशिलिस्ट प्राईवेट अस्पताल हैं जो गरीबी रेखा से नीचे के रोगियों के इलाज के लिए निश्चित प्रतिशत बैडस एवं ओपीडी भी उपलब्ध नहीं कराते। सार्वजनिक क्षेत्र ने निशुल्क स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की जाती हैं, परंतु यहां भी कुछ प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष व्यय में निश्वित वृद्धि हुई है।     इसका अन्य कारण स्वास्थ्य के उपर किया जा रहा सरकारी खर्च भी है जो जी.डी.पी. (स्कल घरेलु उत्पाद) के दो प्रतिशत से भी कम रहा है। जबकि विकसित एवं विकासशील देश जीडीपी का चार से दस प्रतिशत लोगों को सुचारु स्वास्थ्य सेवाएं देने मे व्यय करते हैं।
 
भारत एक ग्रामीण प्रधान देश है और इलाज की सुलभता शहरों में ही ज्यादा उपलब्ध है। इसी वजह से ग्रामीण समाज उचित स्वास्थ्य सेवाओं एवं योग्य चिकित्सक के अभाव में नीम-हकीमों के पास जाने को मजबूर हैं। शहरों में भी स्वास्थ्य सेवाएं समाज के ऊंचें वर्ग तक ही सीमित हैं और झुग्गी-झोपडिय़ों मे रहने वाले लोगों तक भी सभी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ नहीं पहुंंच पा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा भी राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना का प्रचार उल्लेखनीय है, जिसमें बहुत कम पैसे में परिवार के सभी सदस्यों के स्वास्थ्य सुनिश्चित किया जाता है। इन्हीं परिस्थितियों के मद्देनजर अब हरियाणा सरकार ने भी कुछ प्रयास किए हैं, जैसे मुख्यमंत्री मुफ्त इलाज योजना, जिसके अंर्तगत सभी गरीब लोगों का सरकारी अस्पतालों में निशुल्क उपचार का प्रबंध किया गया है। इसके अलावा जननी सुरक्षा योजना एवं जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत डिलीवरी एवं शिशु का सम्पूर्ण उपचार का खर्च सरकार वहन करती है। इसके अतिरिक्त हर जिले में मेडिकल कालेज खोलने की योजना है, जिससे लोगों को विशेष इलाज के लिए अन्य जिलों मे नहीं जाना पड़ेगा।
स्वास्थ्य असमानताओं को खत्म करने के लिए एक बहुआयामी एवं व्यापक रणनीति की जरुरत है, इसमें अधिक से अधिक राजनीतिक ध्यान, स्वास्थ्य सेवा वितरण एवं स्वास्थ्य के सामाजिक, आर्थिक निर्धारकों को लागू करने एवं प्राईवेट सैक्टर को विनियमित करने के साथ एक पुन: व्यवस्था की आवश्यकता है। इसके अलावा पब्लिक प्राईवेट पार्टनशिप पर जोर देने की आवश्यकता है, जिसके अंर्तगत जांच एवं चिकित्सकीय सुविधाएं जन-जन तक सस्ती दरों पर पहुंचाईं जा सकें।
-लेखक: पीजीआईएमएस हेल्थ युनिवर्सिटी में कुलपति
एवं डॉ. बीसी राय अवार्ड प्राप्त हैं