बेहतर रिकवरी की राह पर फार्मा सेक्टर!

नई दिल्ली। देश का फार्मास्युटिक सेक्टर अब अच्छी रिकवरी की राह पर दिख रहा है। फॉरेन डायरेक्ट इनवेस्टमेंट पॉलिसी में बदलाव, अमेरिका में जेनेरिक दवाओं के बाजार में प्राइसिंग पॉलिसी, पेटेंट प्रोटेक्शन, रेगुलेटरी अप्रूवल्स और कंपल्सरी लाइसेंसिंग सरीखे मामलों के कारण यह पिछले काफी समय से चुनौतियों का सामना कर रहा है। जेनेरिक्स सेगमेंट में नए प्रॉडक्ट्स की कम लॉन्चिंग, जीएसटी लागू होने और रेगुलेशंस के पालन की ऊंची लागत ने इस सेक्टर को काफी दिक्कत दी है। सरकार नीतियां बनाने में ज्यादा फोकस करती रही। हाल में उसने फार्मास्युटिकल प्रॉडक्ट्स के लिए एक नया प्राइस इंडेक्स बनाया है, जो देश में बेची जाने वाली सभी दवाओं के दाम तय करने के लिए बेंचमार्क का काम करेगा।
इस बीच, दवा कंपनियों ने रिसर्च एंड डिवेलपमेंट में निवेश बनाए रखा, जिससे उन्हें दुनियाभर के बाजारों के लिए अच्छे प्रॉडक्ट्स तैयार करने में मदद मिली है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर नजर डालें तो अमेरिका में बिकने वाली जेनेरिक दवाओं पर प्राइसिंग का प्रेशर घटा है और इससे इस सेक्टर को सपोर्ट मिल सकता है। देश में फार्मा सेल्स मई 2018 में 10583 करोड़ रुपये की रही, जो सालभर पहले 9549 करोड़ रुपये की थी। यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने हाल में सन फार्मास्युटिकल्स के गुजरात में मौजूद हलोल प्लांट को क्लियरेंस दी है। इससे दवाओं की गुणवत्ता को लेकर कंपनी पर दो साल से लगा इंपोर्ट बैन हट गया। इससे सन फार्मा की बिक्री बढऩी चाहिए।
उधर, चीन ग्रोथ के लिहाज से दुनिया में अच्छे फार्मास्युटिकल मार्केट के रूप में उभर रहा है। भारतीय दवा कंपनियां चीन के बाजार के लिए योजनाएं बना रही हैं और वहां की मैन्युफैक्चरर्स और डिस्ट्रीब्यूटर्स से स्ट्रैटेजिक अलायंस और पार्टनरशिप कर रही हैं।
इससे भारत को चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे को कम करने में मदद मिल सकती है। 2017-18 में चीन के साथ व्यापार घाटा 63.12 अरब डॉलर हो गया था। यह सेक्टर निश्चित रूप से ग्रोथ की राह पर वापसी करता दिख रहा है और भारत जेनेरिक दवाओं के अच्छे एक्सपोर्टर के रूप में उभर रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, अगर यह ट्रेंड बना रहा तो भारतीय दवा उद्योग वैल्यू के लिहाज से साल 2020 में टॉप 10 ग्लोबल मार्केट्स में से एक होगा। यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन और यूरोपियन मेडिसिंस एजेंसी सरीखी प्रमुख संस्थाओं ने जो रेगुलेटरी बदलाव किए हैं, उनसे दवा कंपनियों के लिए इन नियमों के पालन का महत्व बढ़ गया है। भारत में काम कर रही दवा कंपनियों को अपने क्वॉलिटी और कंप्लायंस स्ट्रक्चर्स को बदलना होगा ताकि वे बदलती रेगुलेटरी गाइडलाइंस के मुताबिक रहें। इससे निकट भविष्य में कंपनियों पर कुछ दबाव आ सकता है।