पटना (बिहार)। एंटीबायोटिक दवाओं में बैक्टीरिया को मारने की क्षमता घटी है। राज्य में तीन वर्षों में 48 हजार से अधिक सैंपलों की जांच हुई। पता चला कि संक्रमण फैलाने वाले प्रमुख बैक्टीरिया पर एंटीबायोटिक दवाओं का असर घट रहा है।

खासकर ई-कोलाई, क्लेबसिएला और एस. ऑरियस पर कई दवाओं की मारक क्षमता बेहद कम मिली। एक ही दवा का असर अलग-अलग मेडिकल कॉलेजों में एक जैसा नहीं मिला। यह अध्ययन यूरिन, पस और रक्त के नमूनों पर किया गया। इनमें यूरिन के सैंपलों की तादाद सर्वाधिक थी।

अस्पतालों के हिसाब से बदला दवाओं का असर

यूरिन इन्फेक्शन में सबसे आम ई-कोलाई पर नाइट्रोफ्यूरेंटोइन दवा एनएमसीएच में 86.5 फीसदी मामलों में प्रभावी रही। जबकि जेएलएनएमसीएच भागलपुर में इसका असर घटकर मात्र 44.7 फीसदी रह गया। जेंटामाइसिन और एमिकासिन का असर 70 फीसदी से अधिक पाया गया। वहीं, सिप्रोफ्लॉक्सासिन और एरिथ्रोमाइसिन का असर कई केंद्रों पर कम रहा। एस. ऑरियस और एजिथ्रोमाइसिन की संवेदनशीलता डीएमसीएच में केवल 25.8 फीसदी मिली। एसकेएमसीएच मुजफ्फरपुर में यह 86.3 फीसदी तक प्रभावी पाई गई।

ज्यादा एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस का सीधा संबंध इनके अंधाधुंध इस्तेमाल से जुड़ा है। एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस बढऩे का बड़ा कारण इन दवाओं का अंधाधुंध सेवन है। आम लोगों में धारणा है कि हर बीमारी में एंटीबायोटिक काम करती है। जबकि ऐसा नहीं है। दूसरी बड़ी समस्या अधूरा कोर्स है। मरीज एक-दो खुराक के बाद राहत मिलते ही दवा छोड़ देते हैं। इससे बचे बैक्टीरिया उस दवा के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं।