नई दिल्ली। फार्मा सेक्टर पर मध्य एशिया युद्ध का प्रभाव पडऩे लगा है। भारतीय दवा कंपनियों में लागत तेजी से बढ़ रही है। खास तौर पर मध्य प्रदेश, जहां छोटे और मीडियम दवा बनाने वाले यूनिट्स का बड़ा हब है। कच्चा माल, पैकेजिंग और लॉजिस्टिक्स तीनों ही महंगे हो गए हैं। इससे कंपनियों पर दबाव बढ़ गया है।
पेट्रोकेमिकल से बनने वाले फार्मा सॉल्वेंट्स की कीमतें 30 फीसदी तक बढ़ गई हैं। वहीं ग्लिसरीन के दाम दिसंबर के बाद से करीब 64 फीसदी तक बढ़ चुके हैं। पैरासिटामोल की लागत में भी करीब 26 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई है। दवा बनाने वाली छोटी यूनिट्स पर ये परेशानी कुछ ज्यादा असर डाल रही है।
शिपिंग रूट्स में दिक्कतों की वजह से लॉजिस्टिक्स कॉस्ट भी बढ़ी है। इससे छोटे फार्मा मैन्युफैक्चरर्स पर खासा असर पड़ रहा है। कई छोटी फार्मा कंपनियां जस्ट-इन-टाइम मॉडल पर काम करती हैं। यानी कच्चे माल का ज्यादा स्टॉक नहीं रखतीं। ऐसे में सप्लाई चेन में थोड़ी भी देरी सीधे प्रोडक्शन शेड्यूल को प्रभावित कर सकती है। दवाइयों की कीमतें पहले से ही ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर के तहत रेगुलेटेड हैं। ऐसे में जब कच्चे माल की लागत बढ़ती है, तो छोटी कंपनियों के पास खर्च मैनेज करने की ज्यादा गुंजाइश नहीं बचती।










