सरकारी हेल्थ सिस्टम को ‘तमाचा’

छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में सरकारी अस्पताल से नवजात मृत बच्चे को थैले में रखकर ले जाने की बेबसी

नई दिल्ली: नोटबंदी के ‘मांगे हुए 50 दिन’ बाद जब वर्ष 2016 की आखिरी रात पूरा देश इस इंतजार में था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिटारे से कुछ बड़ा ‘चिराग’ निकलेगा तब मोदी ने गर्भवती महिलाओं को 6000 हजार रुपये सीधे खाते में डालने का यह कहते हुए वायदा किया था कि इससे मेरी माताओं-बहनों का पोषण बढ़ेगा और जच्चा-बच्चा तंदुरुस्ती का सपना साकार होगा, लेकिन अभी सप्ताह ठीक से भी नहीं बीता कि भाजपा शासित छत्तीसगढ़ में गरीब दंपत्ति को सरकारी अस्पताल से नवजात मृत बच्चा थैले में डालकर ले जाने को विवश होना पड़ा। यह घटना बेहद शर्मनाक इसलिए भी है कि यहां के मुख्यमंत्री रमन सिंह डॉक्टर हैं।
बस्तर जिले में सरकार के महारानी मेडिकल कॉलेज से यह दर्द मिला दिहाड़ी मजदूर रमेश और उसकी पत्नी शशिकला को। शशिकला को प्रसव पीड़ा में यहां दाखिल कराया। डॉक्टरों ने प्रसव के बाद बताया कि बच्चा मृत है। मृत बच्चे की खबर से रमेश और शशिकला वैसे ही अंदर से टूट गए थे, लेकिन अस्पताल की ‘शर्मनाक करतूत’ से अगले ही पल मानों दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। अस्पताल प्रबंधन ने तुरंत बिस्तर खाली कर बाहर जाने को कह दिया।
प्रसव से शारीरिक कमजोरी पीड़ा झेल रही पत्नी शशिकला और मृत बच्चे को ले जाने के लिए रमेश ने एंबुलेंस की मांग की तो उसे चलता कर दिया। बेबस रमेश को सामान रखने वाले थैले में मृत नवजात को रखकर ले जाना पड़ा। दिल पिंघला देने वाली इस घटना को जानकर बेशक देशभर में आंखें नम और सिसकियां उठी हो, लेकिन सत्ता की ‘नशीली आंखों’ में 24 घंटे बाद भी नमी नहीं दिखी। मंत्री केदार कश्यप ने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि जानकारी लेकर मामले की जांच करवाएंगे। पता चला है कि अस्पताल के कागजों में करीब 14 सरकारी एंबुलेंस और पुलिस-रेडक्रास एवं कुछ संस्थाओं की 8-10 एंबुलेंस उपलब्ध हैं। क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता सीबी डेनियल ने सरकार से मांग की कि इसे गंभीर अपराध की श्रेणी में रखकर दोषियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की जाए।

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