शिमला (हिमाचल प्रदेश)। पांच सौ दवा कंपनियां बंद होने के कगार पर आ गई हैं। इससे जरूरी दवाओं का संकट खड़ा होने वाला है। दरअसल, केंद्र सरकार की सख्त डेडलाइन खत्म हो गई है। इससे सूबे की फार्मा इंडस्ट्री पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

ये है मामला

बता दें कि हिमाचल प्रदेश देश के प्रमुख फार्मा हब के रूप में जाना जाता है। केंद्र सरकार के रिवाइज्ड शेड्यूल के मानकों को पूरा करने की अंतिम तारीख 31 दिसंबर को समाप्त हो चुकी है। समय सीमा खत्म होते ही राज्य के दवा उद्योगों में हडक़ंप मच गया है।

प्रदेश के बद्दी,सोलन आदि क्षेत्रों में सैकड़ों फार्मा यूनिट्स संचालित हैं। इन इकाइयों से राज्य को बड़ा राजस्व मिलता है। हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार भी मिला हुआ है। मानकों पर खरा न उतर पाने के कारण करीब 500 दवा कंपनियां बंद हो सकती हैं। इससे लगभग 50 हजार से अधिक लोग बेरोजगार हो सकते हैं।

ये है रिवाइज्ड शेड्यूल

केंद्र सरकार ने फार्मा कंपनियों के लिए रिवाइज्ड शेड्यूल एम फॉर्म लागू किया है। यह दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिस का सख्त संस्करण है। सरकार का उद्देश्य है कि देश में बनने वाली दवाएं अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हों।

ज्यादातर फार्मा यूनिट्स MSME श्रेणी की हैं। इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती जमीन की कमी और भारी निवेश है। अलग-अलग दवा सेक्शन के लिए ज्यादा जगह जरूरी है। जबकि कई यूनिट्स सीमित क्षेत्र में स्थापित हैं। ऐसे में कई उद्योग बंद होने की कगार पर पहुंच गए हैं। इसे लागू करने के लिए 31 दिसंबर 2025 तक का टाइम दिया था। अब डेडलाइन खत्म होने के बाद विभाग ने निरीक्षण तेज कर दिए हैं। जो यूनिट्स मानक पूरा नहीं कर पा रही हैं, उन्हें नोटिस जारी किए जा रहे हैं। कई जगहों पर उत्पादन अस्थायी रूप से रोका भी गया है।