नई दिल्ली। भारतीय फार्मा कंपनियां अमेरिकी बाजार में कमजोर पड़ रही हैं। वित्त वर्ष 26 की तीसरी तिमाही के दौरान यह बात सामने आई है। इससे जेनेरिक दवाओं में लगातार मूल्य निर्धारण का दबाव बना रहा। तीव्र प्रतिस्पर्धा और कंपनियों की विशिष्ट उत्पाद चुनौतियां सामने आई हैं। हालांकि कंपनियों ने इसका असर कम करने के लिए नवीन उपचारों की शुरुआत की।

विश्लेषक अमेरिकी जेनेरिक बाजार के निकट भविष्य के परिदृश्य को लेकर सतर्क हैं। अमेरिकी जेनेरिक दवाओं में मूल्य निर्धारण का दबाव अभी खत्म होने की संभावना नहीं है। यह आशंका प्राइमस पार्टनर्स के मुख्य कार्य अधिकारी निलय वर्मा ने जताई है। उनके अनुसार तीव्र प्रतिस्पर्धा, चैनल समेकन और कमोडिटाइजेशन से कीमतों पर दबाव बने रहने के आसार हैं।

इससे भारतीय फार्मा कंपनियों की सीमिक बढ़त होगी। पेप्टाइड्स, इंजेक्टेबल्स, बायोसिमिलर जैसे नवीन उत्पादों की ओर बढऩे से काफी हद तक भरपाई हो सकती है। उनकी मूल्य निर्धारण शक्ति अपेक्षाकृत अधिक है। इसमें प्रतिस्पर्धा की तीव्रता भी कम है।

सन फार्मा ने अमेरिका में काफी हद तक स्थिर प्रदर्शन किया। फॉर्मूलेशन की बिक्री तीसरी तिमाही में महज 0.6 प्रतिशत बढ़ी। उसे कुछ दवाओं में प्रतिस्पर्धा के कारण जेनेरिक दवा कारोबार में आई गिरावट ने बराबर कर दिया।

सिप्ला का उत्तर अमेरिकी कारोबार दबाव में रहा। तिमाही राजस्व सालाना आधार पर 22 प्रतिशत घटकर 1,485 करोड़ रुपये रह गया। इसका मुख्य कारण लैनरियोटाइड आपूर्ति श्रृंखला में चल रही रुकावटें रहीं। भारत का कारोबार दमदार बना रहा। अमेरिका की कमजोरी ने समूचे प्रदर्शन को प्रभावित किया। वहीं, एलेम्बिक फार्मास्युटिकल्स ने अपनी प्रतिस्पधियों से बेहतर प्रदर्शन किया।