नई दिल्ली। खून पतला करने वाली दवाओं का असर कम होने लगा है। दवाएं एस्पिरिन और क्लोपिडोग्रेल कई मरीजों में असर खोती दिख रही है। करीब हर तीसरे मरीज में ये दवाएं काम नहीं कर रहीं।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉक्टरों ने इस संबंध में अध्ययन किया है। इसमें 151 दिल और धमनियों की बीमारी (सीएडी) से पीडि़त मरीजों को शामिल किया गया। जांच में पाया गया कि एस्पिरिन करीब 30 फीसदी मरीजों में बेअसर रही। क्लोपिडोग्रेल का असर इससे भी कम देखा गया। प्लेटलेट एग्रेशन टेस्ट के जरिए यह समझने की कोशिश की कि ये दवाएं खून को थक्का बनने से रोकने में कितनी कारगर हैं। हैरानी की बात है कि मधुमेह से पीडि़त मरीजों में इन दवाओं के प्रति प्रतिरोध ज्यादा पाया गया। अगर दवाएं ठीक से काम नहीं करेंगी तो हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है।
कुछ मरीजों में दोबारा दिल का दौरा भी देखा गया और कुछ मौतें भी हुईं। हालांकि इनके सीधे संबंध पर अभी और शोध की जरूरत बताई जा रही है। शोधकर्ता डॉ. निर्मल घाटी कि बताया अब इलाज के तरीकों में बदलाव की जरूरत है। मरीजों के लिए वन-साइज-फिट्स-ऑल यानी एक जैसी दवा की रणनीति कारगर नहीं रही। भविष्य में मरीज की स्थिति और शरीर की प्रतिक्रिया के हिसाब से दवा तय करनी पड़ सकती है।










