नई दिल्ली। कीटाणुनाशक अब खतरा बन रहे हैं। वैज्ञानिकों ने इस बारे में चेतावनी दी है। एंटीबैक्टीरियल साबुन, वाइप्स और डिसइन्फेक्टेंट अब गंभीर स्वास्थ्य संकट बनने लगे हैं। ये कीटाणुनाशक रसायन बैक्टीरिया को खत्म करने के बजाय उन्हें और मजबूत बना रहे हैं। इससे वे एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधी होते जा रहे हैं। आम लोगों के लिए इन उत्पादों से अतिरिक्त स्वास्थ्य लाभ का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है। इनका अनियंत्रित उपयोग भविष्य में साधारण संक्रमण को भी जानलेवा बना सकता है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के अनुसार एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेन्स (एएमआर) हर साल 10 लाख से अधिक लोगों की जान ले रहा है। यही रुझान रहा तो 2050 तक यह संकट कैंसर जितना घातक बन सकता है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि घरेलू स्तर पर इस्तेमाल होने वाले एंटीबैक्टीरियल उत्पाद भी इस संकट को बढ़ा रहे हैं। यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय जर्नल एनवायर्नमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित हुआ है।

इन उत्पादों में मौजूद रसायन हर दिन लाखों घरों से नालों के जरिये पानी और पर्यावरण में पहुंचते हैं। वहां ये बैक्टीरिया के साथ मिलकर उन्हें और अधिक प्रतिरोधी बनने का मौका देते हैं। समय के साथ यह प्रक्रिया बड़े स्तर पर एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेन्स को बढ़ावा देती है। ये रसायन सिर्फ हैंड सोप या वाइप्स तक सीमित नहीं हैं। डिसइन्फेक्टेंट स्प्रे, कपड़े साफ करने वाले सैनिटाइजर, प्लास्टिक उत्पादों और पर्सनल केयर आइटम्स में भी मौजूद होते हैं।

कोविड के दौरान इन एंटीबैक्टीरियल और डिसइन्फेक्टेंट उत्पादों का उपयोग तेजी से बढ़ा था। अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि आम उपभोक्ता उत्पादों में मौजूद ये रसायन अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान नहीं करते। एएमआर और विषाक्तता (टॉक्सिसिटी) का खतरा बढ़ा सकते हैं।