बाजार में बिक रही दिल की नकली दवा, औषधि विभाग ने जारी किया अलर्ट

लखनऊ। प्रदेश में नकली दवा का कारोबार बढ़ रहा है। खरीदार असली और नकली दवा व उनकी पैकिंग में फर्क न कर पाने के कारण नकली दवा को ही असली समझकर इस्तेमाल कर रहे हैं। लिहाजा, बीमारी पर काबू पाने के लिए दी जा रही दवा बेअसर साबित हो रही है। यूपी के ड्रग कंट्रोलर एके जैन ने 24 फरवरी को ड्रग टीम को पत्र जारी किया है, जिसमें प्रदेश के सभी जनपदों के औषधि निरीक्षक को दिल की नकली दवा की बिक्री पर निगरानी रखने का आदेश जारी किया गया है।

पत्र के मुताबिक एक बड़ी दवा कंपनी की ब्रांडेड दवा ‘क्लोपीटैब’ का नकली कारोबार किया जा रहा है। पत्र में यह बात सामने आते ही यूपी के खाद्द एवं औषधि विभाग ने अलर्ट जारी कर दिया है। दवा के क्रय-विक्रय और वितरण पर कड़ी नजर रखने का आदेश दिया गया है। साथ ही नकली दवा की बिक्री करने वाले कारोबारियों पर सख्त कार्रवाई के भी निर्देश हैं। यह पत्र अन्य राज्यों के ड्रग कंट्रोलर को भी भेजा गया है।

लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के कॉर्डियोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. भुवन चंद्र तिवारी ने कहा कि कोरोना वायरस से हृदय रोगों का खतरा और भी बढ़ गया है। दावा है कि कोरोना काल में देश में दिल के मरीजों की संख्या 10 से 20 फीसद तक बढ़ गई है। जो मरीज वायरस की चपेट में आए हैं, उनमें से कइयों में ह्रदय रोग की समस्या हो गई। इंडियन हार्ट एसोसिएशन के मुताबिक भारत में हर साल 17 लाख लोगों की मौत दिल की बीमारियों की वजह से होती है। इनमें से 50 फीसद हार्ट अटैक उन लोगों को आते हैं, जिनकी उम्र 50 वर्ष से कम हैं। जबकि 25 फीसद लोग 40 वर्ष से कम उम्र के होते हैं।

यूपी ड्रग केमिस्ट एसोसिएशन के प्रवक्ता सुरेश कुमार के मुताबिक राज्य में करीब सवा लाख थोक और फुटकर दवा की दुकानें हैं। इन पर हर रोजाना 150 करोड़ का दवा व्यवसाय होता है। राजधानी लखनऊ में 4800 फुटकर और 3491 थोक दवा की दुकाने हैं। ‘क्लोपीटैब’ टैबलेट ह्रदय रोगियों को दी जाने वाली टैबलेट है। यह रक्त वाहिकाओं में क्लॉटिंग को रोकती है। करोडो़ं की संख्या में इस टैबलेट का इस्तेमाल लोग करते हैं।

मेडिकल का बड़ा हब होने की वजह से राजधानी लखनऊ में हर रोज कई राज्यों से मरीजों का आना जाना लगा रहता है। शहर के सरकारी-प्राइवेट अस्पतालों में हजारों की संख्या में रोज ओपीडी में ह्रदय रोगी पहुंचते हैं। ऐसे में नकली दवा की बाजार में बिक्री होने से मरीजों की जहां जान पर आफत बनी है। असली और नकली पैकेजिंग में फर्क न कर पाने के कारण वे इसका इस्तेमाल करते हैं जिससे कि दवा का असर उन पर बेअसर रहता है।

 

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