रांची: प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि केंद्रों पर कैंसर की दवाएं ब्रांडेड दवाओं की तुलना में 50 से 90 प्रतिशत तक सस्ती मिलती हैं, लेकिन झारखंड के मरीजों को इसका पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा है। दवाओं की आपूर्ति में कमी और डॉक्टरों द्वारा ब्रांडेड दवाएं लिखने की प्रवृत्ति के कारण कैंसर मरीजों के परिवारों को महंगी दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं।

रिम्स के जनऔषधि केंद्र पर सप्लाई ठप

राजधानी रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) के जनऔषधि केंद्र के स्टॉकिस्ट के अनुसार, काफी समय पहले कैंसर की एक-दो दवाएं आई थीं, लेकिन उसके बाद उनकी नियमित आपूर्ति बंद हो गई। रिम्स राज्य का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है, जहां दूर-दराज के जिलों से कैंसर मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में यहां सस्ती दवाएं न मिलना गरीब मरीजों के लिए बड़ी समस्या है।

डॉक्टरों पर ब्रांडेड दवा लिखने का आरोप

दवाओं की कमी के अलावा मरीजों के परिजनों ने एक और गंभीर समस्या उठाई है। उनका आरोप है कि जब वे डॉक्टरों से जेनेरिक या जनऔषधि की दवाएं लिखने का अनुरोध करते हैं, तो कई डॉक्टर नाराज हो जाते हैं। परिजनों के मुताबिक, कुछ डॉक्टर यह कहकर डरा देते हैं कि जनऔषधि केंद्रों पर कैंसर की गुणवत्तापूर्ण दवाएं नहीं मिलतीं और सस्ती दवा से मरीज की हालत बिगड़ी तो जिम्मेदारी परिवार की होगी। इस दबाव में मरीज महंगी ब्रांडेड दवाएं खरीदने को मजबूर हो जाते हैं।

कैंसर का इलाज क्यों है इतना महंगा

कैंसर का इलाज लंबा चलता है और इसमें कीमोथेरेपी, टारगेटेड थेरेपी और सहायक दवाओं का खर्च लाखों रुपये तक पहुंच जाता है। कई परिवारों को इलाज के लिए जमीन-जायदाद तक बेचनी पड़ती है। जनऔषधि योजना का मकसद ऐसी ही दवाओं को सस्ती दर पर उपलब्ध कराना है। जनऔषधि केंद्रों पर मिलने वाली जेनेरिक दवाएं गुणवत्ता जांच के बाद ही बेची जाती हैं।

विशेषज्ञ बोले- केंद्र और कोटा बढ़ाना जरूरी

स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि जब तक झारखंड में जनऔषधि केंद्रों की संख्या नहीं बढ़ाई जाती और केंद्र सरकार के फार्मास्युटिकल्स विभाग से कैंसर दवाओं का नियमित कोटा तय नहीं होता, तब तक इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

मरीज क्या करें

  • डॉक्टर से पर्चे पर दवा का जेनेरिक नाम (साल्ट का नाम) लिखने का अनुरोध करें।
  • जनऔषधि केंद्र पर दवा न मिले तो केंद्र संचालक से उसकी अगली उपलब्धता के बारे में पूछें।
  • दवा बदलने से पहले अपने इलाज करने वाले डॉक्टर से सलाह जरूर लें, खासकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में।
  • आयुष्मान भारत जैसी सरकारी योजनाओं के तहत मिलने वाले मुफ्त इलाज की जानकारी अस्पताल से लें।

सस्ती दवाओं की योजना तभी सफल होगी, जब आपूर्ति नियमित हो और डॉक्टर व मरीज दोनों का जेनेरिक दवाओं पर भरोसा बढ़े।

स्रोत: प्रभात खबर (4 अक्टूबर 2026)