बेंगलुरु (कर्नाटक)। अस्पतालों में दवाओं और मेडिकल उपकरणों के बिल पर खरीद मूल्य (बेस प्राइस) और MRP दोनों अनिवार्य रूप से दिखाने के निर्देश का विरोध शुरू हो गया है। कर्नाटक फार्मा रिटेलर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स ऑर्गनाइजेशन (KPRDO) ने कर्नाटक फूड सेफ्टी एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन (FSDA) से यह सर्कुलर वापस लेने की मांग की है।
KPRDO के अध्यक्ष सी. जयराम और सचिव वी.वी. कप्परशेट्टर ने कहा कि सरकार की पारदर्शिता की मंशा सही है, लेकिन यह व्यवस्था व्यावहारिक रूप से बेहद मुश्किल है। उनका तर्क है कि सर्कुलर कर्नाटक प्राइवेट मेडिकल एस्टेब्लिशमेंट्स (KPME) एक्ट, 2007 के तहत जारी हुआ है, जो केवल अस्पतालों की क्लिनिकल सेवाओं पर लागू होता है। अस्पताल परिसर में चल रही फार्मेसियां ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 के तहत काम करती हैं, इसलिए उन पर यह नियम लागू नहीं हो सकता।
संगठन ने कहा कि केवल स्वास्थ्य क्षेत्र से खरीद मूल्य छापने को कहना भेदभावपूर्ण है, जबकि बाकी सभी कारोबार MRP व्यवस्था पर चलते हैं। दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण केंद्र सरकार के DPCO और NLEM के जरिए होता है। खरीद लागत लगातार बदलती रहती है, जिसे हर बिल पर बैच के हिसाब से दिखाना सॉफ्टवेयर और संचालन के लिए बड़ा बोझ होगा।
पदाधिकारियों ने यह आशंका भी जताई कि बिना संदर्भ के खरीद मूल्य दिखाने से बिलिंग काउंटर पर विवाद बढ़ेंगे और अस्पताल कर्मचारियों की सुरक्षा पर भी असर पड़ सकता है।
