उत्तराखंड: श्रीनगर उपजिला अस्पताल में मुफ्त जांच बंद होने का संकट टला, 31 अक्टूबर तक जारी रहेगी निशुल्क डायग्नोस्टिक सुविधा

श्रीनगर (गढ़वाल): उत्तराखंड के श्रीनगर उपजिला चिकित्सालय में मरीजों की मुफ्त पैथोलॉजी जांच बंद होने का संकट फिलहाल टल गया है। स्वास्थ्य महानिदेशालय ने राज्य की निशुल्क डायग्नोस्टिक योजना के तहत चल रही मौजूदा व्यवस्था को 31 अक्टूबर तक या नई टेंडर प्रक्रिया पूरी होने तक, जो भी पहले हो, जारी रखने के निर्देश दिए हैं।

क्या था मामला

राज्य सरकार की निशुल्क डायग्नोस्टिक योजना के तहत उपजिला चिकित्सालय में पीपीपी (सार्वजनिक-निजी भागीदारी) मॉडल पर चंदन डायग्नोस्टिक के माध्यम से मरीजों की पैथोलॉजी जांचें मुफ्त की जा रही थीं। कंपनी के साथ अनुबंध 30 सितंबर को खत्म हो गया था।

इसके बाद अस्पताल प्रशासन ने घोषणा की थी कि 1 अक्टूबर से मरीजों को जांच के लिए सरकारी दरों पर शुल्क देना होगा और जांचें अस्पताल की अपनी पैथोलॉजी लैब में होंगी। इस खबर से रोजाना जांच कराने आने वाले मरीजों, खासकर ग्रामीण और गरीब परिवारों में चिंता बढ़ गई थी।

देर रात आया राहत भरा आदेश

प्रभारी मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. रचित गर्ग ने बताया कि स्वास्थ्य महानिदेशालय से बुधवार देर रात आदेश प्राप्त हुआ, जिसमें निशुल्क डायग्नोस्टिक जांच की व्यवस्था को 1 अक्टूबर से 31 अक्टूबर तक या नई टेंडर प्रक्रिया पूरी होने तक बढ़ा दिया गया है। इसके बाद मरीजों की जांच पहले की तरह निशुल्क होती रहेगी।

बेस अस्पताल में व्यवस्था पहले जैसी

श्रीकोट स्थित बेस अस्पताल में जांच व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं हुआ है। वहां चंदन डायग्नोस्टिक के माध्यम से मुफ्त जांच की व्यवस्था लागू नहीं थी और मरीज पहले से ही अस्पताल में तय सरकारी दरों पर जांच करा रहे हैं।

नवंबर से क्या होगा?

यह राहत फिलहाल अस्थायी है। अगर 31 अक्टूबर तक नई टेंडर प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तो एक बार फिर मुफ्त जांच व्यवस्था पर सवाल खड़ा हो सकता है। पहाड़ी इलाकों में निजी पैथोलॉजी लैब कम हैं और कई बार मरीजों को जांच के लिए दूर शहरों तक जाना पड़ता है। ऐसे में सरकारी अस्पतालों में मुफ्त जांच की सुविधा यहां के लोगों के लिए बेहद अहम है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि पीपीपी मॉडल पर चल रही ऐसी योजनाओं में अनुबंध खत्म होने से पहले ही नई व्यवस्था तय हो जानी चाहिए, ताकि मरीजों की सुविधा में कोई रुकावट न आए। साथ ही सरकारी अस्पतालों की अपनी लैब को भी मजबूत करना जरूरी है, ताकि किसी निजी एजेंसी पर पूरी तरह निर्भरता न रहे।

स्रोत: अमर उजाला (1 अक्टूबर 2026)

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