“किसी भी मरीज को पहचान प्रमाण के अभाव में अस्पताल में भर्ती करने से वंचित नहीं किया जाएगा ” : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि किसी भी राज्य / केंद्रशासित प्रदेश के स्थानीय आवासीय प्रमाण की कमी या यहां तक ​​कि पहचान प्रमाण के अभाव में किसी भी मरीज को अस्पताल में भर्ती या आवश्यक दवाओं से वंचित नहीं किया जाएगा। न्यायालय ने केंद्र सरकार को 2 सप्ताह के भीतर अस्पताल में दाखिले पर एक समान राष्ट्रीय नीति बनाने का निर्देश दिया है, जिसका सभी अस्पतालों को पालन करना चाहिए। कोर्ट ने आदेश दिया, “केंद्र सरकार, दो सप्ताह के भीतर, अस्पतालों में दाखिले पर एक राष्ट्रीय नीति बनाएगी, जिसका सभी राज्य सरकारों द्वारा पालन किया जाएगा। केंद्र सरकार द्वारा इस तरह की नीति तैयार करने तक, किसी भी रोगी को किसी भी स्थिति में उस राज्य/ यूटी के स्थानीय आवासीय प्रमाण की कमी के लिए, यहां तक कि राज्य/ यूटी के पहचान प्रमाण के अभाव में अस्पताल में भर्ती या आवश्यक दवाओं से वंचित नहीं किया जाएगा।”

न्यायालय ने केंद्र सरकार को 3 मई की आधी रात से पहले या उससे पहले दिल्ली सरकार के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लिए तरल चिकित्सा ऑक्सीजन की आपूर्ति में कमी को सुधारने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देशित किया, “केंद्र सॉलिसिटर जनरल के आश्वासन के संदर्भ में सुनिश्चित करेगा, कि जीएनसीटीडी को ऑक्सीजन की आपूर्ति में कमी सुनवाई की तारीख से 2 दिनों के भीतर, यानी 3 मई, 2021 की मध्यरात्रि को या उससे पहले सुधारे।”

यह आदेश जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस एस रवींद्र भट की पीठ ने जारी किया, जो कि महामारी के दौरान आवश्यक सेवाओं और आपूर्ति के वितरण के मामले की सुनवाई कर रही है। यह फैसला, जिसे 30 अप्रैल को एक दिन की लंबी सुनवाई के बाद सुरक्षित किया गया था, रविवार रात को जारी किया गया। आदेश में अन्य महत्वपूर्ण निर्देश हैं: ऑक्सीजन के लिए भंडारण स्टॉक तैयार करें केंद्र सरकार राज्यों के साथ मिलकर आपातकालीन प्रयोजनों के लिए ऑक्सीजन का भंडारण स्टॉक तैयार करेगी और आपातकालीन स्थिति में भंडारण स्थान का विकेंद्रीकरण करे । आपातकालीन स्टॉक को अगले चार दिनों के भीतर बनाया जाएगा और राज्यों को ऑक्सीजन की आपूर्ति के मौजूदा आवंटन के अलावा, रोजाना के आधार पर फिर से भरपाई करनी होगी ; COVID सहायता के लिए सोशल मीडिया एसओएस कॉल पर कोई कार्यवाही नहीं केंद्र सरकार और राज्य सरकारें सभी मुख्य सचिवों / पुलिस महानिदेशकों / पुलिस आयुक्तों को सूचित करेंगी कि सोशल मीडिया पर किसी भी सूचना या किसी भी मंच पर मदद मांगने / पहुंचाने वाले व्यक्तियों पर कार्यवाही या उत्पीड़न इस न्यायालय द्वारा अधिकार क्षेत्र के एक कठोर अभ्यास को आकर्षित करेगा। रजिस्ट्रार (न्यायिक) को देश के सभी जिला मजिस्ट्रेटों के समक्ष इस आदेश की एक प्रति भेजने का भी निर्देश दिया गया है।

अस्पताल में दाखिले पर राष्ट्रीय नीति केंद्र सरकार दो सप्ताह के भीतर अस्पतालों में दाखिले पर एक राष्ट्रीय नीति बनाएगी, जिसका सभी राज्य सरकारों द्वारा पालन किया जाएगा। केंद्र सरकार द्वारा इस तरह की नीति तैयार करने तक, किसी भी मरीज को किसी भी स्थिति में अस्पताल में भर्ती या आवश्यक दवाओं से वंचित नहीं किया जाएगा। वैक्सीन प्रोटोकोल पर फिर से विचार केंद्र सरकार अपनी पहल और प्रोटोकॉल पर पुनर्विचार करेगी, जिसमें ऑक्सीजन की उपलब्धता, वैक्सीन की उपलब्धता और मूल्य निर्धारण, बेंच द्वारा उठाई गई चिंताओं के आलोक में सस्ती कीमत पर आवश्यक दवाओं की उपलब्धता शामिल है।

सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने COVID वैक्सीन और दवाओं की अनिवार्य लाइसेंसिंग और COVID वैक्सीनेशन नीति में केंद्र और राज्यों के लिए अलग- अलग मूल्य निर्धारण को अनुमति देने के के पीछे तर्क पूछा था। वैक्सीन नीति प्रथम दृष्ट्या अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करती है न्यायालय ने कहा कि जिस तरह से केंद्र की मौजूदा वैक्सीन नीति को लागू किया गया है, उसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक स्वास्थ्य के अधिकार में बाधा उत्पन्न होगी, जो संविधान के अनुच्छेद 21 का एक अभिन्न तत्व है। “जिस तरह से केंद्र की वर्तमान वैक्सीन नीति को लागू किया गया है, उसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक स्वास्थ्य के अधिकार में बाधा उत्पन्न होगी जो संविधान के अनुच्छेद 21 का एक अभिन्न तत्व है। हमारा मानना ​​है कि केंद्र सरकार को अपनी वर्तमान वैक्सीन नीति पर फिर से विचार करना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 के परीक्षण का सामना कर सके।” इस मामले में अगली सुनवाई 10 मई को होगी।

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