चिंता: युवा भारत को खराब कर रही एंटीबायोटिक

नई दिल्ली: भारत समेत पूरी दुनिया में एंटीबायोटिक प्रतिरोधक क्षमता बढऩे से बीमारियों के उपचार में मुश्किलें खड़ी हो रही हैं। रोगों के लिए जिम्मेदार कीटाणु, विषाणु और कुछ परजीवी तत्वों पर एंटीबायोटिक दवाएं बेअसर होती जा रही हैं। कुछ वर्ष पूर्व जेनेवा में आयोजित विश्व स्वास्थ्य सम्मेलन में इस चुनौती की गंभीरता को रेखांकित करते हुए एक वैश्विक कार्यक्रम तैयार किया गया था। उसी कार्यक्रम के सिलसिले में दुनियाभर में 13 से 19 नवंबर तक विश्व एंटीबायोटिक सप्ताह मनाया गया है। एंटीबायोटिक का प्रभाव कम होने के चलते बीमारियां बढक़र जानलेवा हो जाती है।
जानकारी के मुताबिक, दुनिया में सात लाख से अधिक मौतें इसी वजह से होती हैं। यह संख्या आगामी तीन दशकों में एक करोड़ तक पहुंच सकती है। लोगों और पशुओं के साथ कृषि में भी एंटीबायोटिक के व्यापक इस्तेमाल के चलते यह स्थिति पैदा हो रही है। अगर इसे रोका नहीं गया तो जल्दी ही इलाज का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। साधारण रोग भी महामारी का रूप लेकर संकट पैदा कर सकता है।

इस समस्या से आर्थिक दबाव भी बढ़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक इस सदी के मध्य तक सकल वैश्विक उत्पादन में 3.8 फीसदी की कमी एंटीबायोटिक प्रतिरोध की मुश्किल के कारण आ सकती है। अभी कुछ दिन पहले आई एक रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में संक्रामक रोग घातक सिद्ध हो रहे हैं। गर्म जलवायु, स्वच्छता का अभाव, प्रदूषण आदि के कारण बैक्टीरिया-जनित रोग आम हैं। ऐसे में लोग सामान्यत: बिना डॉक्टरी परामर्श के दवा दुकानों से एंटीबायोटिक लेकर खा लेते हैं। इस प्रवृत्ति का एक कारण यह भी है कि हमारे देश में स्वास्थ्य सेवा की उपलब्धता समुचित नहीं है। पशुओं के इलाज में और उनका वजन बढ़ाने के लिए भी एंटीबायोटिक दिया जाता है। मानव शरीर में उनके दूध और मांस के जरिये वह लोगों तक पहुंच रहा है। खेती में रसायनों के भरपूर उपयोग ने भी संकट को गहन करने में योगदान दिया है। एंटीबायोटिक के धड़ल्ले से प्रचलन से बैक्टीरिया और वायरस धीरे-धीरे उनके अभ्यस्त होने लगते हैं तथा उसके प्रतिरोध की क्षमता विकसित कर लेते हैं। ऐसे बैक्टीरिया या वायरस से पीडि़त रोगी को एंटीबायोटिक दवाएं दी जाती हैं तो उनका असर नहीं होता। अगर समय रहते कदम नहीं उठाया गया तो भारत जैसे युवा देश में हालात बेकाबू हो सकते हैं। चूंकि समस्या वैश्विक है, ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परस्पर सहयोग से ही बात बनेगी।

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