नई दिल्ली। दवा निर्यात के नियमों में ढील दे दी गई है। इससे दवा कंपनियों को राहत मिल पाएगी। कैंसर, डायबिटीज व अन्य गंभीर रोगों की दवाएं तैयार करने में जैव तकनीक की मदद ली जाती है। ऐसी दवाओं को आर-डीएनए दवाएं कहा जाता है। अब ऐसी दवाओं को विदेश भेजने की प्रक्रिया आसान हो सकेगी।
केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन ने इसकी जानकारी दी है। सीडीएससीओ के अनुसार अगर किसी दवा को भारत में मंजूरी मिल चुकी है। कंपनी उसे विदेश में सिर्फ दूसरे ब्रांड नाम से बेचना चाहती है। ऐसे में कुछ शर्तें पूरी होने पर अलग से एनओसी नहीं लेनी पड़ेगी। इससे कंपनियों को दोबारा कागजी प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ेगा। निर्यात में लगने वाला समय कम हो सकता है।
कब नहीं लेना होगा अलग एनओसी?
यह छूट हर दवा या हर निर्यात पर लागू नहीं होगी। इसका लाभ तभी मिलेगा, जब कंपनी के पास वैध मंजूरी हो। निर्यात वाले उत्पाद में कोई वास्तविक बदलाव न किया हो। दवा की संरचना, गुणवत्ता के मानक आदि पहले से मंजूर उत्पाद जैसे होने चाहिए। ऐसी स्थिति में अगर अंतर सिर्फ निर्यात वाले ब्रांड नाम का है, तो अलग एनओसी जरूरी नहीं। कंपनी को इसके लिए ऑनलाइन आवेदन करना होगा। जिन मामलों में ये शर्तें पूरी नहीं होंगी, उनमें निर्यात एनओसी लेना जरूरी रहेगा।





