शहर के कमीशनखोर डॉक्टरों के चलते जांच महंगी

रोहतक। मरीजों को जहां उनकी बीमारी परेशानी में डाले रखती है, वहीं दूसरी ओर पैथोलॉजी जांच भी उनकी कमर तोड़ने का काम कर रही है। सस्ती जांच के लिए भी मरीजों से बड़ी रकम वसूली जा रही है। दरअसल, मरीज की जांच में डॉक्टर का कमीशन भी शामिल होता है। कमीशन के कारण ही सस्ती जांच भी महंगी हो जाती है। एक लैब संचालक ने बताया कि डॉक्टरों को हर जांच में 50-60 फीसदी कमीशन देना होता है। डॉक्टर कमीशन के बदले मरीजों को हमारे पास लैब में भेजते हैं। ब्लड सुगर की जांच की वास्तविक दर सामान्य रूप से 30 से 35 रुपए होती है लेकिन डॉक्टरों के कमीशन के कारण मरीजों से 85 से 110 रुपए तक लिए जाते हैं। एक मरीज से लिवर की जांच (एसजीपीटी) के लिए 150 से 185 रुपए लिए जाते हैं, जबकि इसकी वास्तविक दर 60 रुपए होती है। हालांकि, कुछेक डॉक्टर बिना कमीशन के भी जांच लिखते हैं। लेकिन शहर में कम ही डॉक्टर हैं।

एक अन्य लैब संचालक के अनुसार डॉक्टर जैसे-जैसे मरीज भेजने की संख्या बढ़ाते हैं, उनका कमीशन भी बढ़ता जाता है। शुरुआत में लैब संचालक 40 फीसदी तक कमीशन देते हैं, लेकिन बाद में यह 50 से 60 फीसदी तक चला जाता है। लैब संचालक अगर कमीशन देने में आनाकानी करते हैं, तो वे मरीजों को हमारे लैब में नहीं भेजने की बात कहते हैं। इन डॉक्टरों को कमीशन की राशि का भुगतान नकद किया जाता है. सप्ताह या मासिक हिसाब कर लैब संचालक उन तक पैसे पहुंचा देते हैं। डॉक्टर भी पूरा हिसाब-किताब रखते हैं कि उन्होंने कितने मरीजों को किस जांच के लिए लैब में भेजा है।

ऐसा नहीं है कि कमीशन के इस खेल में केवल डॉक्टर ही दोषी हैं। पैथोलॉजी लैब संचालक भी डॉक्टरों से सेटिंग करते हैं। डॉक्टरों को अधिक से अधिक कमीशन देने का प्रलोभन देते हैं। सेटिंग सफल रहने पर तो डॉक्टर भी मरीजों को अपनी पसंद की लैब में भेजना शुरू कर देते हैं। मरीज अगर किसी दूसरी जगह की जांच रिपोर्ट लाता है, तो उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं। यही नहीं, डॉक्टर कई बार तो मरीजों पर भडक़ भी जाते हैं। इस बारे में आईएमए के एक वरिष्ठ डॉक्टर का कहना है कि अगर कुछ डाक्टर ऐसा करते हैं, तो यह गलत है। आइएमए मेंं शुरू से यह सीख दी जाती है कि कमीशन शब्द में डॉक्टर का नाम नहीं आये, इसका ख्याल रखें। आइएमए की जब भी बैठक होती है तो इसके लिए डॉक्टरों को जागरूक किया जाता है। सामान्य जांच के लिए एक एमएल री-एजेंट (जांच में प्रयोग होने वाला केमिकल) का खर्च मुश्किल से 60 से 70 रुपये है यानी एक जांच का खर्च 10 से 12 रुपये आता है। री-एजेंट 100, 200 व 500 एमएल में आता है। सामान्य रूप से एक एमएल में पांच से छह मरीजों की जांच हो जाती है। हर मशीन की क्षमता अलग-अलग होती है। मशीन की क्षमता अधिक होने से मुनाफा भी अधिक होता है।

Related Posts

प्रियागोल्‍ड बिस्‍कुट में जानवरों का चोकर, दूध में डिटर्जेंट

मुंबई। प्रियागोल्‍ड बिस्‍कुट में जानवरों का चोकर पाया गया है। वहीं डोडला डेयरी दूध में डिटर्जेंट मिला है। यूईर ऑर्गेनिक फूड्स के प्रोडक्ट भी जांच में फेल हो गए। FSSAI…

दवा कंपनियों पर लगा जुर्माना वसूलने में नाकाम रही सरकार

लखनऊ (यूपी)। दवा कंपनियों पर लगा जुर्माना वसूलने में सरकार नाकाम रही है। मरीज दवा की कीमत को लेकर भी लूट रहा है। दवाओं की खरीद कीमत से कई गुना…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You Missed

प्रियागोल्‍ड बिस्‍कुट में जानवरों का चोकर, दूध में डिटर्जेंट

  • By Desk
  • October 18, 2026
  • 14 views
प्रियागोल्‍ड बिस्‍कुट में जानवरों का चोकर, दूध में डिटर्जेंट

दवा कंपनियों पर लगा जुर्माना वसूलने में नाकाम रही सरकार

  • By Desk
  • October 18, 2026
  • 13 views
दवा कंपनियों पर लगा जुर्माना वसूलने में नाकाम रही सरकार

डेंगू के वायरस को शरीर में बढ़ने से रोकेगी नई दवा

  • By Desk
  • October 18, 2026
  • 12 views
डेंगू के वायरस को शरीर में बढ़ने से रोकेगी नई दवा

अस्पताल के पोस्टमार्टम रूम में शराब पार्टी, डॉक्टर सस्पेंड

  • By Desk
  • October 17, 2026
  • 21 views
अस्पताल के पोस्टमार्टम रूम में शराब पार्टी, डॉक्टर सस्पेंड

MBBS की फर्जी डिग्री से बने डॉक्टर, 2 धरे गए

  • By Desk
  • October 17, 2026
  • 23 views
MBBS की फर्जी डिग्री से बने डॉक्टर, 2 धरे गए

फार्मा कंपनी के रिएक्टर में ब्लास्ट होने से पांच लोगों की मौत

  • By Desk
  • October 17, 2026
  • 18 views
फार्मा कंपनी के रिएक्टर में ब्लास्ट होने से पांच लोगों की मौत