नकली सैनिटाइजर मामले में हरियाणा-पंजाब हाईकोर्ट ने आरोपी की गिरफ्तारी से पहले जमानत देने से किया इंकार

Fake Sanitizer: नकली सैनिटाइजर (Fake Sanitizer) के मामले में हरियाणा और पंजाब हाईकोर्ट ने आरोपी के दोषसिद्धि से पहले ही जमानत देने से इंकार कर दिया। न्यायमूर्ति जगमोहन बंसल ने यह भी कहा कि प्रत्येक मनुष्य का जीवन ईश्वर का सबसे अनमोल उपहार है। हर किसी के पास “जीवन का बहुत सीमित समय” था जिसे “अक्षमता, व्यक्तिगत शिकायत, या राज्य मशीनरी की क्रूर, अवैध, अनैतिक कार्रवाई” के कारण खराब नहीं किया जा सकता था।

न्यायमूर्ति बंसल ने यह भी स्पष्ट किया कि बाद में निर्दोष पाए गए व्यक्ति को मुआवज़ा देने की न तो कोई व्यवस्था है और न ही दोषमुक्ति से परिवार का बहुमूल्य समय, ऊर्जा, स्थिति, भविष्य, विशेषकर बच्चों को वापस लौटाया जा सकता है, जो कमाऊ व्यक्ति के जेल जाने के बाद खो गया था।

उपस्थित नहीं होने पर गिरफ्तारी के गैर-जमानती वारंट जारी किए (Fake Sanitizer)

न्यायमूर्ति बंसल लुधियाना के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा 9 सितंबर को पारित आदेश को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसके तहत याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत जमानत बांड रद्द कर दिए गए थे और उपस्थित नहीं होने के बाद गिरफ्तारी के गैर-जमानती वारंट जारी किए गए थे।

न्यायमूर्ति बंसल ने जोर देकर कहा कि गिरफ्तारी का इरादा और जमानत से इनकार करने का कारण मुकदमे के समय आरोपी की उपस्थिति सुनिश्चित करना था। मुक्ति चाहने वाले व्यक्ति को दोषसिद्धि की स्थिति में निर्णय लेना और सजा देना आवश्यक था। आरोपित अपराध की प्रकृति, निर्धारित दंड की गंभीरता, प्रथम दृष्टया उपलब्ध साक्ष्य, अभियुक्त का इतिहास और पृष्ठभूमि यह संकेत दे सकती है कि किसी भी प्रकार का बांड और ज़मानत दोषसिद्धि के समय उसकी उपस्थिति को सुरक्षित नहीं कर पाएगी।

गिरफ्तारी का उद्देश्य न तो दंडात्मक था, न ही निवारक

न्यायमूर्ति बंसल ने कहा कि गिरफ्तारी का उद्देश्य न तो दंडात्मक था, न ही निवारक। हिरासत या गिरफ्तारी न केवल किसी व्यक्ति को अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार से वंचित करती है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत गारंटीकृत स्वतंत्रता से भी वंचित करती है।

न्यायमूर्ति बंसल ने कहा आदतन अपराधियों को छोड़कर, गिरफ्तारी के बाद साधारण जीवन जीने वाले आम लोग आत्म-सम्मान और आत्मविश्वास खो देते हैं। भले ही विवाद विशुद्ध रूप से संविदात्मक या नागरिक प्रकृति का हो, फिर भी आपराधिक कानून लागू करना आम बात हो गई है। 

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याचिका को स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति बंसल ने कहा कि बांड या पीओ/व्यक्ति घोषणा को रद्द करने का उद्देश्य उपस्थिति सुनिश्चित करना था। याचिकाकर्ता मुकदमे का सामना करने के लिए आगे आया था और हर तारीख पर अदालत के समक्ष उपस्थित होने का वचन दिया था। इस प्रकार, उनकी उपस्थिति न्याय के उद्देश्यों को पूरा करेगी।

 

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