पटना (बिहार)। कैंसर की दवाएं बाजार से गायब हो गई हैं। इसके पीछे सोने-चांदी और प्लैटिनम का साइड इफेक्ट बताया जा रहा है। इन धातुओं की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर अब दवा उद्योग पर दिखने लगा है। इस कारण से कई दवाएं आउट ऑफ स्टॉक हो गई हैं।

दरअसल, इन दवाओं की लागत बढऩे के कारण निर्माण बंद हो गया। अब नई कीमत तय करने को लेकर सरकार के स्तर पर प्रक्रिया चल रही है। इसके बाद यह बाजार में उतरने की उम्मीद है। इससे आने वाले समय में कैंसर उपचार, मेडिकल इम्प्लांट, उपकरणों की लागत बढ़ सकती है। बीते एक वर्ष में सोने की कीमतों में 35 प्रतिशत, चांदी में 30 प्रतिशत तथा प्लैटिनम में 25 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। इसका असर उन दवाओं पर सबसे अधिक पड़ रहा है। जिनके निर्माण में इन धातुओं का प्रत्यक्ष उपयोग होता है।

कैंसर की दवाओं पर सबसे ज्यादा असर

प्लैटिनम का उपयोग कई महत्वपूर्ण कैंसररोधी दवाओं के निर्माण में किया जाता है। इनमें सिस्प्लैटिन, कार्बोप्लैटिन और ऑक्सालिप्लैटिन प्रमुख हैं। फेफड़े, अंडाशय, मूत्राशय, वृषण और बड़ी आंत के कैंसर के उपचार में इन दवाओं का व्यापक उपयोग होता है। उत्पादन लागत में अचानक वृद्धि से कुछ निर्माताओं ने इन दवाओं का उत्पादन रोक दिया था।

बिहार ड्रगिस्ट एवं केमिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष पीके सिंह ने बताया सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन दवाएं मूल्य नियंत्रण के दायरे में आती हैं। ऐसे में निर्माता बढ़ी हुई लागत का पूरा बोझ मरीजों पर नहीं डाल सके। यही कारण है कि इन दवाओं का उत्पादन आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो गया। सोने का उपयोग रुमेटाइड आर्थराइटिस के उपचार में प्रयुक्त कुछ विशेष दवाओं में किया जाता है। वहीं, चांदी का उपयोग सिल्वर सल्फाडियाजीन क्रीम, एंटीमाइक्रोबियल ड्रेसिंग, घाव भरने वाली पट्टियों, कैथेटर और संक्रमण नियंत्रण उपकरणों में व्यापक रूप से होता है।