मुंबई। देश में बच्चों के दिल की बीमारियों के इलाज की खाई पाटने के लिए केवल नए कार्डियक सेंटर खोलना काफी नहीं है, बल्कि विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या बढ़ाना ज्यादा जरूरी है। यह कहना है चाइल्ड हार्ट फाउंडेशन (CHF) के संस्थापक और बाल हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. विकास कोहली का।
डॉ. कोहली के अनुसार 1990 के दशक की शुरुआत में देश में केवल दो-तीन संस्थान ही नवजात के दिल का ऑपरेशन कर पाते थे। अब ऐसे यूनिट कई गुना बढ़ गए हैं। आयुष्मान भारत, जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम और राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) से इलाज और स्क्रीनिंग आसान हुई है। लेकिन यह प्रगति कुछ बड़े शहरों तक ही सीमित है।
भारत में हर साल दो लाख से ज्यादा बच्चे जन्मजात हृदय रोग के साथ पैदा होते हैं। इनमें से करीब हर पांचवें बच्चे को पहले साल में ही प्रक्रिया की जरूरत पड़ती है। कर्नाटक में RBSK टीमों ने तीन साल में करीब 41,000 स्कूली बच्चों में जन्मजात हृदय रोग पाया, लेकिन आधे से भी कम का इलाज हो सका।
उन्होंने बताया कि सरकारी भर्ती में बाल हृदय रोग विशेषज्ञों और कार्डियक सर्जनों के लिए अलग पद नहीं हैं। केरल के ‘हृदयम’ कार्यक्रम का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि स्क्रीनिंग को विशेषज्ञ टीमों से जोड़ने से वहां शिशुओं की मौतों में 41% की कमी आई। मेडिकल कॉलेजों में स्वीकृत पद और ट्रेनिंग सीटें बढ़ाने तथा जिला अस्पतालों के बाल रोग विशेषज्ञों को बेसिक इकोकार्डियोग्राफी सिखाने की जरूरत है।
