नई दिल्ली। भारतीय मेडिकल उपकरणों के निर्यात में जान आने की आस जगी है। इसके पीछे अमेरिकी टैरिफ 50 फसदी से घटाकर 18 करने का असर बताया जा रहा है। स्वास्थ्य सेवा क्षेत्रों में भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में लागत लाभ मिलने की संभावना है।

विश्लेषकों का कहना है कि इस कदम से भारत की सापेक्ष स्थिति में सुधार हुआ है। इससे सभी क्षेत्रों में निवेश संबंधी निर्णयों, क्षमता उपयोग और निर्यात नियोजन पर प्रभाव पड़ेगा। भारतीय उत्पाद अब कम आधार दर पर अमेरिका में प्रवेश करते हैं। इससे कीमतों में स्पष्टता आती है। इससे दीर्घकालिक अनुबंधों को लेकर अनिश्चितता कम होती है। अमेरिका को भारत के विनिर्माण निर्यात में फार्मास्यूटिकल्स, चिकित्सा उपकरण, विशेष रसायन और मध्यवर्ती उत्पाद शामिल हैं। ऐसे क्षेत्र जहां अनुबंध वार्ता और क्षमता नियोजन में टैरिफ स्थिरता एक प्रमुख कारक है।

हालांकि टैरिफ में कटौती अमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात पर लागू होती है। अधिकारियों का कहना है कि विदेशों में मजबूत मांग का घरेलू बाजार पर सीमित प्रभाव ही पड़ेगा। निर्यात की अधिक मात्रा से अक्सर निर्माताओं की उत्पादन क्षमता में सुधार होता है। इससे स्वास्थ्य संबंधी आम उत्पादों की घरेलू आपूर्ति स्थिर बनी रहती है। इसमें सिरिंज, कैथेटर, आईवी कैनुला, जैसे उत्पादित होने वाले चिकित्सा उपकरण शामिल हैं। इनकी घरेलू आपूर्ति भारतीय कंपनियां निर्यात और घरेलू दोनों बाजारों में करती हैं।

घरेलू कीमतें इनपुट लागत, मांग की स्थिति और मूल्य नियमों पर निर्भर करती रहेंगी। खासकर विनियमित चिकित्सा उपकरणों के मामले में। चिकित्सा उपकरण उन क्षेत्रों में से हैं जिन्हें शुरुआती लाभ मिलने की उम्मीद है।