लखनऊ (उप्र)। इंसुलिन और मेडिसिन के दाम बढऩे से डायबिटीज का इलाज महंगा हो गया है। मेडिकल कंसल्टेशन के साथ-साथ जरूरी दवाएं महंगी हो रही हैं। इससे मरीजों का बजट बिगड़ रहा है। खासकर डायबिटीज के मरीजों के लिए मुश्किलें बढ़ गई हैं। दवाओं और इंसुलिन की कीमतों में 10-15 फीसदी का उछाल आया है। प्राइस हाइक के पीछे रॉ मटेरियल की बढ़ती लागत बड़ा कारण है। हेल्थकेयर का यह बढ़ता खर्च आम आदमी पर सीधा असर डाल रहा है।

लगातार बढ़ रहे दाम

राजधानी में इंसुलिन और दवा का सालाना टर्नओवर करीब 70-80 करोड़ है। यह हर साल 10-15 फीसद की दर से बढ़ रहा है। इनके रेट हर साल बढ़ते हंै। कंपनियां चालाकी करते हुए दाम और बढ़ा रही हैं। लॉजिस्टिक और मैटेरियल के बढ़ते दामों के कारण भी दवा के दामों में बढ़ोतरी हुई है। इसके चलते इंसुलिन और शुगर कंट्रोल वाली दवाओं के दामों में उछाल आया है।

इसका खामियाजा दवा व्यापारियों और मरीजों, दोनों को उठाना पड़ता है। दवा व्यापारियों का करीब 1-2 फीसद तक का मार्जिन कम हो जाता है। मरीजों को दवा पहले के मुकाबले अधिक दाम देने पड़ते हैं।

डायबिटीज टाइप-1 और टाइप-2 होती है। इसमें टाइप-1 के लिए इंसुलिन लेने की जरूरत होती है। बॉडी खुद से नेचुरल इंसुलिन नहीं बना पाती। यह सबसे ज्यादा बच्चों में होती है। जबकि टाइप-2 में दवा लेने की जरूरत पड़ती है। दवा का असर होना कम हो जाता है तो इंसुलिन लेना पड़ता है। सर्जरी या प्रेग्नेंसी के दौरान भी इंसुलिन की जरूरत पड़ती है। विभाग में टाइप-1 के रोजाना 2-3 नए केस आते हैं।

भारत में इसका प्रिवलेंस करीब 1 फीसद के आसपास है। ओपीडी में आने वाले 100 डायबिटीज के मरीजों में 10 फीसद में टाइप-1 की ही समस्या होती है। इसमें मरीज को आजीवन इंसुलिन की जरूरत पड़ती है। अन्य कोई विकल्प नहीं होता। समय पर इंसुलिन न लेने पर मरीज की मौत भी हो सकती है।