दुर्गम पहाड़ियों में शीबा का रोमांच

नई दिल्ली: मरीजों की देखभाल में ज्यादातर समय गुजारने वाली दिल्ली के राम मनोहर लोहिया (आरएमएल) अस्पताल की 25 वर्षीय स्टाफ नर्स शीबा रोज जब पिछले दिनों परिवार के साथ उतराखंड घूमने गई तो पहाड़ों के आड़े-तिरछे रास्तों पर साधारण-सी ऑल्टो कार से इस कदर बिंदास फर्राटा भर रही थी मानों यहां घूमना उसकी दिनचर्या में शुमार है। पहाड़ों की रानी मसूरी से पहली बार इस रोमांचकारी अंदाज में मुलाकात करके लौटी शीबा बेहद खुश है। वह कहती हैं कि मुकाम छोटा हो या बड़ा, लड़कियों को जब भी परिवार ने खुले मन से उड़ान भरने का मौका दिया है तो बेटियों ने भी आसमां पर अपना नाम लिखने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अस्पताल में रोगी की पीड़ा देखकर थोड़ा भावुक हो जाने वाली शीबा चुनौतियों से चुटकी में निपटने का माद्दा रखती है।
     उत्तराखंड के पर्यटन विशेषज्ञों की मानें तो बेशक पहले के मुकाबले अब हिल स्टेशन के अधिकतर रास्ते पक्के और चौड़े हो गए हैं लेकिन कई जगह आज भी रास्ते इतने खतरनाक हैं जहां थोड़ी-सी लापरवाही जान जोखिम में डाल सकती है। देहरादून-मसूरी के स्थानीय चालकों के मुताबिक, पहाड़ों में गाड़ी चलाना हर किसी के वश की बात नहीं। उसके लिए अच्छे-खासे प्रशिक्षण की जरूरत है। किसी लडक़ी द्वारा पहली बार परिवार को साथ लेकर साधारण कार से इन ऊंची पहाडियोंं की यात्रा का साहस जुटाना वाकई उपलब्धि भरा कदम है। दिल्ली से गाड़ी का स्टेरिंग संभालते हुए स्टाफ नर्स शीबा ने देहरादून से मसूरी की चढ़ाई के बाद 32 किलोमीटर और ऊपर पहाड़ी पर स्थित धनौल्टी की मनोरम वादियों को छुआ। इस सबके बीच भट्टाफॉल के संकरे और आसपास गहरी खाई वाले रास्ते पर उन्हें थोड़ी हिचक जरूर महसूस हुई लेकिन मजबूत हौसले के साथ आगे बढ़ते हुए प्रकृति के इस खूबसूरत नजारे का भी भरपूर लुत्फ उठाया।
     स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो चिकित्सा पेशे से जुड़े डॉक्टर हों या नर्स या फिर अन्य स्टाफ, सभी का दिलो-दिमाग से मजबूत होना बेहद जरूरी है। कई बार रोगी इतनी विकट स्थिति में आता है जिसका उपचार और देखभाल करने से कमजोर दिल का व्यक्ति हाथ खींचने की कोशिश करता है। ‘फीमेल’ नर्सों की नई पीढ़ी में इस तरह की साहसिक भागीदारी को हेल्थ विशेषज्ञ चिकित्सकीय नजरिए से ‘शुभ’ मानते हैं।