राजनीति सें बाहर रख, संजीदगी से सुधारें स्वास्थ्य की दशा और दिशा: डॉ पंकज सोलंकी

किसी भी देश में रोटी कपडा मकान और स्वास्थ्य कभी भी राजनीति का विषय नहीं होने चाहिए। मगर हमारे देश में आजादी के 70वें वर्ष में भी ये मुद्दे है। देश में स्वास्थ्य सम्बंधित परेशानियों को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 26 मई को सहारनपुर की रैली में 2 बातें कही। एक घोषणा और एक प्रार्थना। घोषणा तो यह थी की डॉक्टर्स की रिटायरमेंट 65 वर्ष तक बढ़ाई गई। इससे क्यास लगाये गए कि डॉक्टर्स बहुत खुश होंगे, कुछ हुए भी और साथ ही प्रार्थना की सभी डॉक्टर्स हर महीने की 9 तारीख को गर्भवती महिलाओं का मुफ्त में इलाज करें। बातें तो सबको स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैय्या करने के सन्दर्भ में कही गयी थी, मगर मुझे और मेरे जैसे बहुत से नयी पीढ़ी के डॉक्टर्स को ये दोनों बातें एक चरमराते हुए सिस्टम को थोड़ी देर सम्भालने वाली लगी।
आज भी देश की 70 प्रतिशत जनसंख्या गांव में रहती है और उनके पास सिर्फ 2 प्रतिशत ही स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स है। और ये हम सब जानते है कि गांव में रहने वाली ये जनसंख्या सिर्फ 2 प्रतिशत पर निर्भर नहीं रह सकती है। आज देश में करीब 15000 के करीब पीएचसी सिर्फ एक डॉक्टर के भरोसे और 2200 के करीब बिना किसी डॉक्टर के भरोसे चल रही है। लोग सोचते है कि देश में डॉक्टर्स की भारी कमी है। कमी है, लेकिन भारी कमी नहीं। और जो कमी हो रही है वो सरकार के उदासीन रवैय्ये की वजह से ही रही है। सिर्फ डॉक्टर्स को रूरल पोस्टिंग देने से सरकार की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती है। जरुरत है कि डॉक्टर को इलाज करने के लिए मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाए। सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा की सिर्फ दिशा निर्देश से परिस्थिति नहीं बदल सकती है बल्कि इसके लिए उपाय करने पड़ेंगे। यहां बातें नहीं संजीदगी की आवश्यकता है। आज का युवा डॉक्टर सरकारी अस्पताल में काम करने से कतराने लगा है, क्योंकि इलाज करने के लिए जरुरी सामान कम है और परेशानियां अधिक। अगर मरीज को मात्र देख लेने से ही इलाज हो जाए तो मैं भी ओपीडी में ना बैठ कर घंटो अस्पताल के बाहर चारपाई डाल कर मरीजों को देखता रहूं।

एक और बहुत ही विचित्र सी बात दिखने लगी है पिछले कुछ वर्षों से सरकारी अस्पतालो में बड़े नेता से ले कर छुटभैया नेता तक अपने लोगो के बीच धौंस जमाने के लिए अस्पताल की कार्यप्रणाली में दख्लअंदाजी करते है। वो डॉक्टर्स को बताते है कि इलाज किसका और कैसे होना है, जैसे साक्षात् ब्रह्मा है। उनकी इस तुच्छ सोच से कितने मरीज परेशान होते है इसका उन्हें अंदाजा तक नहीं।
एक बच्चा डॉक्टर बनने का जब सपना सजाता है तो सिर्फ यही सोचता है कि वह समाज की सेवा करेगा मगर आज का लगभग  हर युवा डॉक्टर अपने आने वाली  नस्ल को डॉक्टर नहीं बनाना चाहता। इसका दोष सिर्फ केंद्र सरकार को नहीं बल्कि राज्य सरकार को भी बराबर की हिस्सेदारी लेनी होगी।
आज के इस बदलते हालात में देश को जरुरत है कि अपने युवा डॉक्टर्स में ज्यादा से ज्यादा विश्वास दिखाया जाए। केंद्र और राज्य सरकारों को एक ऐसी नीति बनानी होगी की देश के डॉक्टर्स देश में ही रहे और उनके अंदर बहार जाने का विचार भी उत्पन्न न हो पाए। देश को जरुरत है युवा डॉक्टर्स प्रणाली में अधिष्ठापन किया जाए। एक ऐसी नीति बने की डॉक्टर्स हर जगह पर काम करने को उत्साहित रहे और उन्हें इलाज के लिए मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराई जाए ताकि इस पवित्र पेशे की गरिमा बनी रहे।
-लेखक: फेडरेशन ऑफ रेजीडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (फोरडा) 
के अध्यक्ष एवं अंबेडकर अस्पताल , दिल्ली में चिकित्सक हैं
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